बदायूं/मुरादाबाद मंडल/शाहजहांपुर।
मेरठ से प्रयागराज तक करीब 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेसवे को उत्तर प्रदेश के सबसे आधुनिक और सुरक्षित एक्सप्रेसवे में गिना गया। एक्सप्रेसवे के निर्माण और संचालन के दौरान अत्याधुनिक निगरानी व्यवस्था, हर किलोमीटर पर कैमरे, पेट्रोलिंग, आपातकालीन सहायता और त्वरित रेस्क्यू जैसी व्यवस्थाओं के दावे किए गए थे। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक पूरे मार्ग पर यातायात और यात्रियों की निगरानी के लिए आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था तैयार की गई है। बदायूं में भी करीब 92 किलोमीटर हिस्सा एक्सप्रेसवे का है।
लेकिन एक्सप्रेसवे शुरू होने के कुछ ही महीनों में लगातार सामने आ रहे हादसे अब इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सड़क पर हर किलोमीटर पर CCTV कैमरे लगे होने का दावा है, तो फिर सड़क पर घूमते गोवंश, कुत्ते और अन्य जानवर निगरानी टीम को क्यों नहीं दिखाई देते? अगर कैमरे केवल वाहनों की रफ्तार देखने और चालान के लिए हैं, तो सड़क सुरक्षा के लिए उनकी वास्तविक उपयोगिता क्या है?
नेपाल से चंडीगढ़ जा रहे परिवार पर टूटा कहर, कुत्ते को बचाने में तीन की मौत
बदायूं के वजीरगंज थाना क्षेत्र में 19 अगस्त को गंगा एक्सप्रेसवे पर हुए दर्दनाक हादसे ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने का काम किया है। चैनल नंबर 175 के पास नेपाल के रुपैडिया बॉर्डर से चंडीगढ़ जा रही अर्टिगा कार के सामने अचानक कुत्ता आ गया। उसे बचाने के प्रयास में तेज रफ्तार कार अनियंत्रित होकर कई बार पलट गई।
हादसे में नेपाल के डांग जिले की दीपना खात्री और विपना सुनमगर समेत तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि छह लोग घायल हुए। वाहन में चालक सहित नौ लोग सवार थे।
यहां सवाल सिर्फ चालक की गलती का नहीं है। सवाल यह भी है कि एक्सप्रेसवे की निगरानी व्यवस्था में जानवरों की मौजूदगी को रोकने और समय रहते उन्हें हटाने की जिम्मेदारी किसकी है?
शाहजहांपुर में गोवंश से टकराकर कार चार बार पलटी
शाहजहांपुर क्षेत्र में भी गंगा एक्सप्रेसवे पर गोवंश का झुंड पहुंचने की समस्या सामने आई है। बुधवार रात गुरुग्राम निवासी आईएफटी कंपनी के निदेशक सौम्य उपाध्याय की कार जलालाबाद क्षेत्र में गुलड़िया गांव के पास सड़क पर बैठे गोवंश से टकरा गई। तेज रफ्तार के कारण कार चार बार पलटने के बाद डिवाइडर से जा टकराई। हादसे में सौम्य उपाध्याय और उनके सहयोगी संजय कुमार सिंह घायल हुए।
सबसे गंभीर बात यह है कि स्थानीय स्तर पर लगातार यह शिकायत सामने आती रही है कि गोवंश के झुंड एक्सप्रेसवे तक पहुंच रहे हैं।
अगर पेट्रोलिंग टीम लगातार एक्सप्रेसवे पर गश्त करती है और CCTV कैमरों से निगरानी होती है, तो सड़क पर बैठे पशुओं को देखकर उन्हें तत्काल हटाने की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती?
पहले भी सामने आया था फेंसिंग का सवाल
जून में अमरोहा क्षेत्र में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी गंगा एक्सप्रेसवे पर छूटी हुई फेंसिंग और खुली बाउंड्री से जानवरों के प्रवेश को हादसों की वजह बताया गया था। रिपोर्ट में नीलगाय और सांड समेत जानवरों के एक्सप्रेसवे पर पहुंचने का उल्लेख किया गया और सुरक्षा व्यवस्था सुधारने की जरूरत बताई गई थी।
यानी समस्या नई नहीं है। सवाल यह है कि अगर समस्या की पहचान पहले ही हो चुकी थी तो उसे स्थायी रूप से दूर करने के लिए क्या किया गया?
तीन महीने का रिपोर्ट कार्ड: हादसों की लंबी सूची
29 अप्रैल 2026 को गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन हुआ और इसके बाद अलग-अलग चरणों में टोल वसूली शुरू हुई। मेरठ-बदायूं खंड पर 17 मई से टोल वसूली शुरू हुई।
उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों में मई से अगस्त के बीच कई गंभीर हादसे दर्ज हुए हैं।
10 मई—हापुड़: कैंटर डिवाइडर से टकराकर पलटा, दो महिलाओं और आठ महीने के बच्चे समेत तीन लोगों की मौत हुई।
10 मई—हरदोई: तेज रफ्तार स्कॉर्पियो डिवाइडर पर चढ़कर पलटी, बीटेक छात्र की मौत और चार लोग घायल हुए।
10-11 मई—बदायूं: मूसाझाग क्षेत्र में टायर फटने से स्लीपर बस पलट गई। एक यात्री की मौत और 30 से अधिक लोग घायल हुए।
मई—शाहजहांपुर क्षेत्र: गंगा एक्सप्रेसवे के पास हादसे में भूपेंद्र और ग्रीस की मौत हुई। दोनों नई लोडर गाड़ी खरीदने जा रहे थे।
27 मई—संभल/मुरादाबाद मंडल: दो कारों की आमने-सामने भिड़ंत में डॉक्टर अरविंद कुमार और उनकी बेटी यामिनी की मौत हुई तथा छह लोग घायल हुए।
12 जून—बदायूं: पिकअप और ट्रक की टक्कर में दो लोगों की मौत हुई। मृतकों में एक बरेली सराय और दूसरा मुरादाबाद के पाकबड़ा क्षेत्र का रहने वाला था।
12 जून—उन्नाव: सड़क किनारे खराब खड़े ट्रक में कार घुसने से चार युवकों की मौत हो गई। रिपोर्ट में यह सवाल भी उठा कि यदि ट्रक को समय रहते हटवा दिया जाता तो हादसा टल सकता था।
11 जून—संभल/अमरोहा क्षेत्र: जम्मू-कश्मीर से लौट रहे परिवार की स्कॉर्पियो डिवाइडर से टकराई। कारोबारी समेत तीन लोगों की मौत और आठ लोग घायल हुए।
जून—अमरोहा: हादसों का सिलसिला इतना बढ़ा कि एक रिपोर्ट में पांच दिन में पांच मौतों का उल्लेख किया गया।
जुलाई—बदायूं: तेज रफ्तार पिकअप का टायर फटने से हादसा हुआ, जिसमें सोमवीर यादव की इलाज के दौरान मौत हो गई और सात मजदूर घायल हुए।
जुलाई—शाहजहांपुर: ट्रक का टायर फटने के बाद नीचे उतरे हेल्पर को पीछे से आ रही डीसीएम ने टक्कर मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई।
13 जुलाई—मेरठ: गंगा एक्सप्रेसवे पर हादसे में रालोद के पूर्व छात्र नेता आदित्य पवार की मौत और उनके साथी विजय सिंह राणा के गंभीर घायल होने की खबर सामने आई।
26 जुलाई—संभल: डबल डेकर बस पलटने के बाद दूसरी लेन में बैठे यात्रियों को ट्रक ने कुचल दिया। विभिन्न रिपोर्टों में दो से तीन मौतें और 22 से अधिक घायलों की जानकारी सामने आई।
अगस्त—हरदोई: पचदेवरा क्षेत्र में कार खड़े ट्रक में जा घुसी। हादसे में चालक और उसके ढाई वर्षीय बेटे की मौत हुई तथा तीन लोग गंभीर घायल हुए।
19 अगस्त—बदायूं: सड़क पर आए कुत्ते को बचाने के प्रयास में अर्टिगा पलटने से नेपाल की दो महिलाओं समेत तीन लोगों की मौत और छह लोग घायल हुए।
इन घटनाओं से साफ है कि समस्या केवल एक स्थान या एक प्रकार के वाहन तक सीमित नहीं है। कहीं जानवर सड़क पर पहुंच रहे हैं, कहीं खराब वाहन सड़क किनारे खड़े हैं, कहीं डिवाइडर से वाहन टकरा रहे हैं और कहीं बसों तथा भारी वाहनों से हादसे हो रहे हैं।
मुरादाबाद मंडल में भी सुरक्षा पर सवाल
गंगा एक्सप्रेसवे सीधे मुरादाबाद जनपद से नहीं गुजरता, लेकिन इसका महत्वपूर्ण हिस्सा अमरोहा और संभल से होकर गुजरता है और इन घटनाओं की रिपोर्टिंग मुरादाबाद ब्यूरो से भी होती रही है। मई के अंत तक एक रिपोर्ट में मंडल क्षेत्र में गंगा एक्सप्रेसवे पर एक महीने में 15 बड़े हादसे और छह मौतें दर्ज होने की बात कही गई थी।
इस आंकड़े को देखते हुए यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर हादसों को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?
CCTV सिर्फ चालान के लिए या जान बचाने के लिए?
गंगा एक्सप्रेसवे पर कैमरों के जरिए वाहनों की गति और यात्रियों की गतिविधियों पर नजर रखने का दावा किया गया है।
ऐसे में सवाल सीधे ऑपरेटर और निगरानी व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए—
अगर CCTV कैमरे सड़क पर नजर रख रहे हैं तो सड़क पर घूमता कुत्ता या बैठा हुआ गोवंश कैमरे में क्यों नहीं दिखता?
अगर दिखाई देता है तो उसे हटाने के लिए पेट्रोलिंग टीम कितनी देर में पहुंचती है?
क्या कंट्रोल रूम में ऐसी घटनाओं के लिए कोई रियल टाइम अलर्ट सिस्टम है?
क्या ऐसे सभी स्थानों का रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है जहां बार-बार पशु पहुंचते हैं?
और यदि किसी स्थान पर फेंसिंग कमजोर या टूटी हुई है तो उसे ठीक करने में इतनी देरी क्यों?
अब सिर्फ अस्थायी पेट्रोलिंग नहीं, स्थायी समाधान चाहिए
हादसों को रोकने के लिए एक्सप्रेसवे के उन सभी स्थानों को चिन्हित किया जाना चाहिए जहां से कुत्ते, गोवंश, नीलगाय या अन्य पशु बार-बार सड़क पर पहुंच रहे हैं।
इन स्थानों पर सामान्य तारबंदी के बजाय मजबूत और पर्याप्त ऊंचाई वाली फेंसिंग, नीचे से बंद सुरक्षा जाल और जहां जरूरी हो वहां अतिरिक्त बैरियर लगाए जाने चाहिए।
साथ ही
- CCTV से पशुओं की मौजूदगी का तत्काल अलर्ट कंट्रोल रूम तक पहुंचे।
- पेट्रोलिंग टीम को निर्धारित रिस्पांस टाइम में मौके पर भेजा जाए।
- एक्सप्रेसवे के किनारे खुले हिस्सों और टूटी फेंसिंग का नियमित ऑडिट हो।
- खराब वाहन खड़े होने पर तत्काल रेस्क्यू/टोइंग की व्यवस्था हो।
- दुर्घटना संभावित स्थानों की ब्लैक स्पॉट जैसी सूची तैयार की जाए।
- हर गंभीर हादसे के बाद केवल पुलिस जांच नहीं बल्कि ऑपरेटर की सुरक्षा व्यवस्था का भी ऑडिट हो।
- पशुओं के प्रवेश वाले स्थानों पर स्थायी समाधान लागू होने तक अतिरिक्त पेट्रोलिंग लगाई जाए।
सबसे बड़ा सवाल—लोग महंगा टोल किसलिए दे रहे हैं?
गंगा एक्सप्रेसवे पर सफर करने वाला वाहन चालक टोल देता है। वह सिर्फ सड़क की डामर की पट्टी के लिए पैसा नहीं देता, बल्कि उससे उम्मीद होती है कि उसे सुरक्षित, नियंत्रित और बेहतर निगरानी वाली सड़क मिलेगी।
तो सवाल यह उठता है—
क्या लोग इतना महंगा टोल अपनी मौत का जोखिम उठाने के लिए दे रहे हैं?
क्या कंपनी की जिम्मेदारी केवल टोल वसूलने तक सीमित है या यात्रियों को सुरक्षित सड़क उपलब्ध कराना भी उसकी जिम्मेदारी है?
अगर सड़क पर कुत्ता या गोवंश आ जाता है और उसके कारण किसी परिवार का सदस्य जान गंवा देता है, तो CCTV और पेट्रोलिंग व्यवस्था की जवाबदेही कौन तय करेगा?
और सबसे अहम—
जब हादसे बार-बार एक जैसी परिस्थितियों में हो रहे हैं, तो उन्हें रोकने के लिए स्थायी कदम कब उठाए जाएंगे?
गंगा एक्सप्रेसवे को विकास और तेज रफ्तार का प्रतीक बताया गया था। अब जरूरत इस बात की है कि इसे सुरक्षित सफर का भी प्रतीक बनाया जाए। क्योंकि एक्सप्रेसवे की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने वाहन उस पर दौड़े और कितना टोल जमा हुआ, बल्कि इससे भी मापी जानी चाहिए कि कितने यात्री सुरक्षित अपने घर पहुंचे।

























