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Loksabha Election 2024: See How Raebareli Changed And What Is Current Situation. – Amar Ujala Hindi News Live – रायबरेली के मुद्दे:अब जीत के लिए इरादे भी बुलंद चाहिए, जानें


लोकसभा चुनाव 2024: देखिए कैसे बदला रायबरेली और क्या हैं मौजूदा हालात?

रायबरेली में लगे उद्योग व (नीचे) बकुलाही ड्रेन।
– फोटो : amar ujala

विस्तार


गांधी परिवार का गढ़ है तो खास बात होगी। विकास होगा। तरक्की की तस्वीर होगी। खुशहाली होगी। सड़कें चकाचक, स्वास्थ्य सुविधाएं भी बेहतर, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जुदा हैं। फिलहाल यहां सियासी सरगर्मी है। चर्चा में है कि गांधी परिवार की विरासत आखिर संभालेगा कौन? उत्सुकता के बीच रायबरेली का रण रोमांचक होते जा रहा है। इस सब के बीच आम लोगों के मुद्दे भी जमीन तलाशने लगे हैं। जिनकी पड़ताल कर रही है धर्मेश त्रिवेदी  की रिपोर्ट…

उद्योग: इंदिरा गांधी के समय यहां एक के बाद एक उद्योग खुले, जिससे युवाओं को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार मिला। पलायन रुका और खुशहाली भी आई। लेकिन वक्त के साथ उद्योग सिमटते गए। बीते 43 साल में 103 से अधिक छोटे-बड़े उद्योग बंद हुए। इससे आज युवाओं को परदेश जाना पड़ रहा है।

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एनटीपीसी की राख : ऊंचाहार एनटीपीसी परियोजना की अरखा राख तालाब की उड़ती धूल लोगों को बीमार कर रही है। सीपेज के पानी से सैकड़ों बीघे जमीन बंजर हो गई। समस्या से निजात के लिए किसान करीब 20 वर्ष से आवाज उठा रहे हैं। राख से दम घुट रहा है। यहां हैंडपंप भी दूषित पानी दे रहे हैं।

रिंग रोड: सांसद सोनिया गांधी के प्रयास से निर्माणाधीन रिंगरोड पर 10 वर्ष बाद भी फर्राटा भरने का सपना हकीकत नहीं बन सका। निर्माण वर्ष 2014 में शुरू हुआ था। काम कराने के लिए कई कंपनियां आईं, लेकिन काम अधूरा छोड़कर सभी भाग गईं। धीमे निर्माण पर हाईकोर्ट भी अफसरों को फटकार चुका है।

बकुलाही नाला: बकुलाही ड्रेन किसानों के लिए अभिशाप बन गई है। असल में रोहनिया गांव के पास से बकुलाही ड्रेन निकली है। लगभग 142 किमी लंबी ड्रेन सिल्ट से पट गई। इससे सई नदी तक बहकर जाने वाला पानी किसानों के खेत में रुकने लगा। इससे करीब एक हजार हेक्टेयर जमीन पर खेती बंद हो गई है।

उद्योग बंद हुए

स्पीनिंग मिल — 2012

शीना होमटेक — 2005

अपकॉन केबल्स — 2001

रावल पेपर मिल — 1998

मोदी कॉर्पेट — 1998

वेस्पा — 1995

मित्तल फर्टिलाइजर — 1992

यूपी टायर ट्यूब  — 1992

कृष्णा पेपर मिल  — 1983

सीतापुर पेपर मिल  — 1982

गंगा एस्बेस्टेस  — 1980

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