बदायूं। जनपद के सैंजनी गांव स्थित एचपीसीएल प्लांट में हुए दोहरे हत्याकांड को लेकर अब मामला सिर्फ हत्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मृतक अधिकारियों के परिजनों ने साफ आरोप लगाया है कि “खाकी और खादी के मिलन” ने ही इस हत्या को अंजाम दिलवाया, उन्होंने मामले की जांच SIT की बजाय CBI से कराने की मांग की है।

मंगलवार को प्रशासन ने मुख्य आरोपी अजय प्रताप सिंह की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चलाते हुए 11 दुकानों को ध्वस्त किया और 50 से अधिक दुकानों को खाली कराया। साथ ही ग्राम समाज की करीब 20 बीघा जमीन पर खड़ी फसल को भी जोत दिया गया।

लेकिन इस कार्रवाई के बीच ही अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह सिर्फ औपचारिक कार्रवाई है?

स्थानीय लोगों का दबी जुबान यह कहना है कि जहां प्रशासन ने शुरुआत में केवल 6 दुकानों की बात की वहां हकीकत में 50 से 60 दुकानें सरकारी जमीन पर बनी हुई बताई जा रही हैं । लोगों का आरोप है कि प्रशासन इस केस में अभी भी पूरी कार्रवाई से बचता नजर आ रहा है। इसका कारण बड़े स्तर पर खादी का हस्तक्षेप बताया जा रहा है जो बैकडोर से मामले को दबाने के लिए प्रयासरत है,,,

वहीं सोशल मीडिया पर भी SIT जांच को लेकर लोगों में अविश्वास देखने को मिल रहा है। लोग पुराने कफ सिरप मामले का उदाहरण देते हुए कह रहे हैं कि SIT जांच अक्सर “बड़ी मछलियों” को बचाने का जरिया बन जाती है। ऐसे में बदायूं केस में भी वैसा ही होने की आशंका जताई जा रही है।

वहीं परिजनों का आरोप है कि यह घटना सुनियोजित थी और इसमें कई लोग शामिल हैं। उनका कहना है कि जब तक आरोपी की कॉल डिटेल और नेटवर्क की गहराई से जांच नहीं होगी, तब तक असली साजिशकर्ता सामने नहीं आएंगे। इस घटना के सीसीटीवी फुटेज में पूरा केस होगा लेकिन उसमें भी छेड़छाड़ की आशंका है,,

इधर, यह भी सामने आया है कि आरोपी ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर बाजार खड़ा कर लिया था और यहां तक कि सरकारी आवास योजना का लाभ भी अपने तीन परिजनों के नाम पर ले लिया था । इसके बावजूद इसमें संलिप्त संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना भी जांच पर सवाल खड़े कर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मुख्यमंत्री की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की बात होती है, तो फिर जमीन पर यह “बंदरबांट” कैसे चल रही थी?जबकि कुछ बर्ष पूर्व इसी दातागंज क्षेत्र के आवास की चाबी सौंपने के एक कार्यक्रम में पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने एक लाभार्थी महिला से चाबी देते हुए माइक पर यह पूछ लिया था कि इसके बदले आपने किसी को रूपये तो नहीं दिए हैं तब उस महिला ने माइक पर ही 35000 रु देने कि बात बता दी थी जिसका वीडियो सोसल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था,, उसके बाद बड़े अधिकारीयों कि जिम्मेदारी बनती थी कि इन आवास वितरण कि गोपनीय जाँच कराते,, पर लगता है हमाम में सब नंगे है जो मुख्यमंत्री कि नीतिओं कि धज्जिया उडाने में लगे हुए हैं झूठी रिपोर्ट बनाकर उन्हें गुमराह कर रहे हैं,,

जनता के बीच चर्चा है कि यह तो “छोटी मछली” है, इसके जरिए कई “बड़ी मछलियां” हर महीने मोटी कमाई कर रही थीं।

फिलहाल पुलिस ने कुछ संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है, लेकिन परिजन और आम जनता अब भी एक ही मांग पर अड़े हैं—
“सच्चाई सामने लानी है तो जांच CBI से कराई जाए।”

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