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ऊँचा पद,शानदार पैकेज, ऊँची डिग्री… फिर भी नहीं हो रहे रिश्ते: आधुनिक दौड़ में विवाह से दूर होती युवा पीढ़ी-बदलती सोच पर समाज को करना होगा गंभीर चिंतन,

जेन-ज़ी में बढ़ रहा कुंवारेपन का विस्फोट,तरक्की की अंधी दौड़ में वैवाहिक रिश्तों से दूर हो रहा युवा समाज,

✍️ स्वदेश केसरी न्यूज़ के तहसील प्रभारी ललित मोहन वार्ष्णेय की कलम से……

देश में तेजी से बदलती जीवनशैली और आधुनिकता की दौड़ के बीच आज सभी समाज का युवा वर्ग एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां कैरियर, पैसा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते-देते परिवार और वैवाहिक जीवन पीछे छूटते जा रहे हैं। जनपद बदायूं में बिल्सी समेत आसपास के कस्बों और देश के कई छोटे-बड़े शहरों में यह बदलाव साफ दिखाई देने लगा है।

समाजशास्त्रियों और अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में युवा विवाह से दूरी बना सकते हैं। कई रिपोर्टों में यह संभावना जताई गई है कि लगभग 40–45 प्रतिशत युवतियाँ विवाह को टाल सकती हैं या उससे दूर रह सकती हैं। पहली नज़र में यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रगति का प्रतीक लगता है, लेकिन गहराई से देखा जाए तो यह सामाजिक संतुलन के लिए एक गंभीर संकेत भी हो सकता है।

कैरियर की दौड़… पर जीवन अधूरा

आज की बेटियां डॉक्टर, इंजीनियर, सीए और उद्यमी बन रही हैं, जो निस्संदेह समाज के लिए गर्व की बात है। आर्थिक आत्मनिर्भरता महिलाओं को नई पहचान दे रही है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या कैरियर ही बिना विवाह के पूरा जीवन है?

पैसा, पद और प्रतिष्ठा जीवन को सुविधाजनक जरूर बना सकते हैं, लेकिन सुख-दुख बांटने वाला एक जीवन साथी का साथ ही परिवाररुपी जीवन को पूर्णता देते हैं। अकेलेपन की बढ़ती समस्या और मानसिक तनाव के मामलों में हो रही बढ़ोतरी भी इसी बदलाव की ओर संकेत करती है।

परिवार व्यवस्था पर पड़ रहा असर

समाज में एक ओर अविवाहित युवकों की संख्या बढ़ रही है, तो दूसरी ओर युवतियों का विवाह टालने का रुझान भी तेजी से सामने आ रहा है। इससे परिवार व्यवस्था और सामाजिक संरचना पर भी प्रभाव पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो आने वाले समय में समाज में अकेलापन, मानसिक तनाव और रिश्तों की कमी जैसी समस्याएं और बढ़ सकती हैं।

“अभी नहीं” से “कभी नहीं” तक

कई परिवारों में माता-पिता विवाह के लिए रिश्ते तलाशते हैं, लेकिन अक्सर युवतियां या युवा कहते हैं—“अभी नहीं, पहले कैरियर।” धीरे-धीरे यही “अभी नहीं” कई बार “कभी नहीं” में बदल जाता है।

बाद में जब जीवन के अगले पड़ाव पर पहुंचकर अकेलेपन का एहसास होता है, तब कई लोग मानसिक दबाव, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं शारीरिक हार्मोन्स के बदलाव के कारण सामाजिक अलगाव का सामना करते हैं।

जीवनसाथी चुनने की सोच में भी बदलाव जरूरी

समाज के वरिष्ठ लोगों का मानना है कि विवाह केवल आर्थिक समानता का संबंध नहीं, बल्कि संस्कार, समझ और सहयोग का रिश्ता है।

अगर कोई युवती पढ़ी-लिखी है और अच्छी आय भी अर्जित कर रही है, तो उसे जीवनसाथी चुनते समय केवल आय या पद को ही मापदंड नहीं बनाना चाहिए। कई बार अपने से कम कमाने वाला लेकिन संस्कारवान, सहयोगी और जिम्मेदार जीवनसाथी भी सुखी पारिवारिक जीवन का आधार बन सकता है।

पुराने समय में भी ऐसा ही संतुलन देखने को मिलता था—एक व्यक्ति आर्थिक जिम्मेदारी निभाता था, तो दूसरा परिवार और रिश्तों को संभालता था। यह भूमिका लड़का या लड़की—कोई भी निभा सकता है।

संतुलन ही असली प्रगति

आधुनिकता और प्रगति का अर्थ यह नहीं कि परिवार और रिश्ते पीछे छूट जाएं। असली प्रगति वह है जिसमें कैरियर और पारिवारिक जीवन दोनों का संतुलन बना रहे।यदि समाज का भविष्य अकेलेपन और भावनात्मक दूरी की ओर बढ़ेगा, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय होगा। इसलिए जरूरी है कि युवा पीढ़ी अपने सपनों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए।

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