

इस्लामनगर/बिल्सी (बदायूं)। इस्लामनगर थाना क्षेत्र के ग्राम ब्यौर कासिमाबाद में प्रभात फेरी के मार्ग को लेकर उपजा विवाद अब प्रशासनिक प्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से शांतिपूर्ण चली आ रही धार्मिक परंपरा को पुलिस प्रशासन ने बिना समुचित संवाद और जमीनी हकीकत को समझे अचानक ‘विवादित’ घोषित कर दिया, जिससे गांव में अनावश्यक तनाव और ग्रामीणों के बीच मे मनमुटाव की स्थिति पैदा हो गई।
शनिवार की सुबह हालांकि हालात सामान्य रहे और भारी पुलिस बल की मौजूदगी में प्रभात फेरी ग्रामीणों द्वारा बताये जा रहे परंपरागत मार्ग से शांतिपूर्ण ढंग से निकाली गई। श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए उसी रास्ते से गुजरे, जिस रूट को लेकर शुक्रवार को बवाल हुआ था। इससे पहले एसएसपी बदायूं द्वारा प्रभात फेरी की निगरानी और शांति व्यवस्था की जिम्मेदारी पूर्व थानाध्यक्ष हरेंद्र सिंह व ऋषिपाल सिंह को सौंपी गई थी।
शुक्रवार को कैसे बिगड़े हालात
गौरतलब है कि शुक्रवार सुबह सीओ बिल्सी संजीव कुमार और इस्लामनगर थानाध्यक्ष नरेश सिंह ने भारी पुलिस बल के साथ प्रभात फेरी को रोक दिया था। पुलिस द्वारा मार्ग को “संवेदनशील और विवादित” बताए जाने के बाद ग्रामीणों में आक्रोश फैल गया।
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि बजरंग दल सहित कई हिंदू संगठनों के पदाधिकारी गांव पहुंचे, पुलिस पर लाठीचार्ज का आरोप लगाते हुए जमकर नारेबाजी की गई। दोपहर करीब एक बजे इस्लामनगर थाने का घेराव कर धरना शुरू कर दिया गया, जहां हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ भी किया गया। प्रदर्शनकारियों ने थानाध्यक्ष को हटाने की मांग तक कर डाली।
दूसरे दिन बैकफुट पर प्रशासन
बढ़ते दबाव और बिगड़ते हालात को देखते हुए प्रशासन को बैकफुट पर आना पड़ा। शनिवार को उघैती, बिल्सी, बिसौली, जरीफनगर समेत आसपास के थानों का पुलिस बल और पीएसी गांव में तैनात की गई।
नायब तहसीलदार बिसौली गिरिजा शंकर यादव, सीओ बिल्सी संजीव कुमार और इस्लामनगर थाना पुलिस की मौजूदगी में प्रभात फेरी उसी पारंपरिक मार्ग से सकुशल संपन्न कराई गई, जिसको लेकर विवाद खड़ा हुआ था।
55 साल पुरानी परंपरा पर सवाल क्यों?
ग्रामीणों के अनुसार, माघ माह में निकलने वाली प्रभात फेरी वर्ष 1970 से गांव के काली मंदिर से प्रारंभ होकर करीब 2 से ढाई किलोमीटर का भ्रमण करते हुए विसर्जन स्थल तक जाती रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 2012 में रास्ते की खराब हालत और कीचड़ के कारण मजबूरी में मार्ग बदला गया था, लेकिन यह बदलाव अस्थायी था। गांव में स्पष्ट सहमति थी कि रास्ता ठीक होते ही प्रभात फेरी फिर पुराने मार्ग से निकाली जाएगी।
ग्रामीणों का आरोप है कि जब सड़क दुरुस्त हो गई और परंपरा बहाल करने का समय आया, तभी प्रशासन ने इसे अचानक “विवादित मार्ग” बताकर रोकने की कोशिश की।
संवाद की कमी बनी टकराव की वजह
स्थानीय लोगों और बुजुर्गों का कहना है कि यदि प्रशासन समय रहते ग्रामीणों से संवाद करता, गांव के इतिहास और धार्मिक परंपरा को समझता, तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते।
ग्रामीणों का आरोप है कि किसी लिखित शिकायत की जानकारी न तो सार्वजनिक की गई और न ही यह स्पष्ट किया गया कि किसके कहने पर मार्ग को विवादित बताया गया। इससे पुलिस कार्रवाई पर संदेह और गहरा गया।
लोगों का यह भी कहना है कि संवाद की जगह निर्देश थोपे गए, जिससे असंतोष बढ़ता गया और स्थिति टकराव में बदल गई।
ग्रामीणों का दावा है कि अर्धसत्य सूचनाओं और देर से लिए गए फैसलों ने एक शांत धार्मिक परंपरा को अनावश्यक विवाद में बदल दिया।
स्थिति नियंत्रण में, लेकिन सवाल बाकी
हालांकि प्रशासन का दावा है कि वर्तमान में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है और गांव में शांति बनी हुई है, लेकिन यह पूरा घटनाक्रम प्रशासनिक संवेदनशीलता, स्थानीय परंपराओं की समझ और संवाद की आवश्यकता पर बड़ा सवाल छोड़ गया है।


























