


बिसौली (बदायूं)। बदायूं जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर बिसौली तहसील का गांव निजामुद्दीनपुर शाह इन दिनों अपने नाम और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर खासा चर्चा में है। गांव का इतिहास जहां मुगल काल से जोड़ा जाता है, वहीं 1857 के गदर से जुड़ी घटनाएं और प्राचीन सांस्कृतिक अवशेष आज भी ग्रामीणों की स्मृतियों में जीवित हैं। हालिया दिनों में गांव के नाम को लेकर उठी आपत्तियों और नाम परिवर्तन की मांग ने इस ऐतिहासिक गांव को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।
मुगल काल से जुड़ा गांव का नाम
ग्रामीणों के अनुसार निजामुद्दीनपुर शाह नाम मुगल शासन काल में प्रचलन में आया और तभी से यह नाम सरकारी अभिलेखों में दर्ज होता चला गया। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यह नाम किसी मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था अथवा उस समय के प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा हो सकता है।
1857 के गदर की छाप
गांव के 80 वर्षीय बुजुर्ग श्यामलाल मौर्य बताते हैं कि वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय इस गांव में मुस्लिम आबादी काफी अधिक थी। गदर के दौरान हालात बिगड़ने पर गांव के कई मुस्लिम परिवार यहां से पलायन कर गए। इनमें से अधिकांश परिवार दिल्ली के निजामुद्दीनपुर क्षेत्र तथा उत्तर प्रदेश के नगीना-धामपुर इलाके में जाकर बस गए।
श्यामलाल मौर्य का कहना है कि आज भी दिल्ली के निजामुद्दीनपुर मोहल्ले में रहने वाले कुछ बुजुर्ग इस गांव के इतिहास और अपने पूर्वजों के संबंधों की जानकारी दे सकते हैं।
प्राचीन खेड़ा और सिक्कों की कहानी
ग्रामीणों के अनुसार गांव में कभी एक प्राचीन खेड़ा हुआ करता था। वर्षों पहले हुई खुदाई के दौरान वहां से कुछ पुराने सिक्के मिलने की भी चर्चा रही है। बताया जाता है कि इन सिक्कों पर सन 1740 अंकित था और उन पर भगवान रामचंद्र एवं माता सीता की प्रतिमाएं बनी हुई थीं।
ग्रामीण इन अवशेषों को गांव के प्राचीन हिंदू और सांस्कृतिक इतिहास से जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि गांव का अतीत केवल मुगल काल तक सीमित नहीं, बल्कि उससे भी पहले का रहा है।
दिल्ली और नगीना-धामपुर तक जुड़ाव
निजामुद्दीनपुर शाह से पलायन कर चुके परिवारों के बुजुर्ग आज भी दिल्ली के रेलवे स्टेशन के पास स्थित निजामुद्दीनपुर मोहल्ले और नगीना-धामपुर क्षेत्र में मिल जाते हैं। वे आज भी इस गांव को अपना पैतृक स्थान बताते हैं और समय-समय पर गांव के इतिहास की चर्चा करते हैं।
बदली जनसंख्या संरचना
वर्तमान समय में गांव की जनसंख्या संरचना में बड़ा बदलाव आ चुका है।
ग्रामीणों के अनुसार:
- मुस्लिम आबादी अब घटकर लगभग 300 के आसपास रह गई है।
- हिंदू आबादी 4000 से अधिक बताई जा रही है।
गांव के निवासी आशुतोष पाठक, मनोज वार्ष्णेय, हरिद्वारीलाल, बंटी वार्ष्णेय और पंकज वार्ष्णेय बताते हैं कि उन्होंने बचपन से गांव का नाम निजामुद्दीनपुर शाह ही सुना है और यही नाम सरकारी रिकॉर्ड में भी दर्ज है। हालांकि, अब गांव के नाम को लेकर चर्चा और आपत्तियां सामने आने लगी हैं।
नाम परिवर्तन की उठी मांग
गांव के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने गांव के नाम को लेकर आपत्ति दर्ज कराई है। उनका तर्क है कि वर्तमान में गांव में हिंदू आबादी बहुसंख्यक है और यहां प्राचीन हिंदू सांस्कृतिक धरोहरों के प्रमाण भी मिले हैं। ऐसे में गांव का नाम किसी हिंदू महापुरुष, देवी या देवता के नाम पर रखे जाने पर विचार किया जाना चाहिए।
इस मांग को लेकर गांव में चर्चाएं तेज हो गई हैं और ग्रामीण प्रशासन से इस विषय पर विचार करने की अपील कर रहे हैं।
बुनियादी सुविधाओं की कमी भी मुद्दा
इतिहास और नाम विवाद के बीच ग्रामीणों ने गांव की मूलभूत समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आज भी कई बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।
- गांव के आसपास कोई इंटर कॉलेज नहीं है।
- प्राथमिक शिक्षा के बाद छात्रों को इंटर तक की पढ़ाई के लिए करीब 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है।
प्रशासन से उम्मीद
ग्रामीणों का कहना है कि गांव का नाम बदलना या न बदलना प्रशासन का विषय है, लेकिन इतिहास, वर्तमान स्थिति और जनभावनाओं को ध्यान में रखकर इस पर विचार जरूर होना चाहिए।
नाम परिवर्तन की मांग और ऐतिहासिक चर्चाओं के बीच निजामुद्दीनपुर शाह गांव एक बार फिर अपने अतीत, पहचान और भविष्य को लेकर चर्चा के केंद्र में आ गया है।


























