सोशल मीडिया पर बड़े बड़े दावे करने वाले नेता अब घिरते नजर आए,




बदायूं। बीजेपी मंडलाध्यक्ष पिटाई कांड अब एक नया रूप ले चुका है। जिस मामले को लेकर कल तक सोशल मीडिया पर जिले के सत्ता पक्ष के कई माननीय और उनके समर्थक अपना-अपना “श्रेय” लेने की होड़ में लगे थे, वही केस आज कोर्ट के फैसले के बाद बिल्कुल उलट दिशा में चलता दिख रहा है।
कुछ दिनों पहले तक जिले के कुछ शीर्ष नेता और उनके समर्थक अपनी सोशल मीडिया पोस्टों में यह दावा कर रहे थे कि इस केस मे “कार्रवाई उनके प्रयासों से हुई है”, वहीं दूसरी तरफ कुछ पोस्टों में इस कार्रवाई को एक समाज विशेष की अपनी एकता और ताकत बताकर दूसरे समाज के लोगों को उलाहना भी दिया जा रहा था।
लेकिन आज कोर्ट के आदेश के बाद हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
अब वही “छुट भैया नेता” जो इस कार्रवाई का श्रेय लेने में आगे थे, खुद को असहज स्थिति में पा रहे हैं, क्योंकि यह मामला जिस तरह पलटा, उससे यह साफ है कि राजनीति में कौन कब पाला बदल ले—कुछ कहा नहीं जा सकता। आज का फैसला कई लोगों को अंदर ही अंदर “सीख” दे गया है।
पुलिस पर पहले सवाल, अब कोर्ट की नाराज़गी – पुलिस बनी दोनों तरफ से असहज
इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे थे।
- घटना के तुरंत बाद लोग सोशल मीडिया पर पुलिस की धीमी कार्यवाही को लेकर उनके खिलाफ कार्यवाही हो गई थी जिसको लेकर लोग उन पर सोशल मीडिया के माध्यम से हमला बोल रहे थे।
- फिर नेताओं के दबाव में तेजी से कार्रवाई हुई, आरोपियों की गिरफ्तारी हुई—तो पुलिस पर राजनीतिक दबाव में काम करने के आरोप लगे।
- और अब, जब मामला कोर्ट तक पहुँचा, तो कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा दिए।
स्थिति ऐसी बन गई कि पुलिस ना घर की रही ना घाट की—दोनों तरफ से आलोचना की शिकार।
क्या था पूरा मामला
21 अक्टूबर की रात आदर्शनगर निवासी मयंक सक्सेना और उन्हें बचाने आए बीजेपी मंडलाध्यक्ष गोपाल शर्मा की कुछ लोगों ने पिटाई कर दी थी। अगले दिन पुलिस ने मयंक की तहरीर पर आदित्य यादव, हर्षित और ऋषभ के खिलाफ-जानलेवा हमला-लूट के प्रयास की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर तीनों को गिरफ्तार कर लिया था।
गवाहों ने कोर्ट में बदल दिया बयान – आरोपियों को जमानत
बाद में मयंक और गोपाल ने कोर्ट में शपथपत्र देकर कहा कि “आरोपियों ने उनके साथ कोई वारदात नहीं की थी”। इसके बाद कोर्ट ने सिविल लाइंस थाना पुलिस को मयंक और गोपाल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए। लेकिन विवेचक इंस्पेक्टर क्राइम विजय बहादुर सिंह ने नया मुकदमा लिखने के बजाय उसी पुराने मुकदमे में धाराएँ बढ़ा दीं, जिसे कोर्ट ने गंभीर त्रुटि माना।
तीनों आरोपियों को कोर्ट से सशर्त जमानत मिल गई।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी – विवेचक छह महीने की ट्रेनिंग पर
अपर सत्र न्यायालय/विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावित क्षेत्र) ने कहा-विवेचक ने न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं किया, विधिक प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ किया, आदेश पर तीन दिन तक अमल नहीं किया कोर्ट ने इसे कर्तव्य लापरवाही और विधिक प्रक्रिया की अवमानना माना।
एसएसपी को आदेश दिया गया है कि इंस्पेक्टर को छह महीने की ट्रेनिंग पर भेजा जाए। सीओ सिटी को इसकी निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है और पाँच दिन के भीतर रिपोर्ट मांगी गई है।
राजनीतिक दावों पर भी बड़ा सवाल
कई राजनीतिक समर्थक सोशल मीडिया पर कल तक लिख रहे थे—
- “हमारे नेता के दबाव में FIR हुई”
- “हमारी एकता से गिरफ्तारी हुई”
लेकिन आज कोर्ट की कार्यवाही ने इस पूरी कहानी की दिशा बदल दी।
अब वे सभी पोस्ट और दावे सोशल मीडिया पर लोगों के बीच व्यंग्य और सवालों का विषय बन गए हैं।
कोर्ट के फैसले के बाद बड़ा सवाल
लोग अब पूछ रहे हैं—
- क्या पुलिस ने शुरू में कार्यवाही नहीं करके सही फैसला लिया या फिर बाद मे दबाब मे आकर जल्दीबाज़ी में गलत मुकदमा लिखा?
- क्या राजनीतिक दबाव में कार्रवाई हुई?
- क्या गवाह शुरुआत से ही दबाव में थे?
- जब पुलिस ने तेजी दिखाई, तब सवाल—और जब कोर्ट ने डाँटा, तब पुलिस अकेली क्यों?
यही वजह है कि यह केस पुलिस के लिए सबसे असहज स्थितियों में से एक बन गया—पहले लोग नाराज़, फिर कोर्ट नाराज़।
अब देखने वाली बात यह है कि आगे इस मामले में पुलिस क्या कदम उठाती है और राजनीतिक गलियारों में चल रही “श्रेय की लड़ाई” किस मोड़ पर समाप्त होती है।
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