बदायूं। आगामी मेला ककोड़ा को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता एवं पशु अधिकार प्रेमी विकेंद्र शर्मा ने एक गंभीर मुद्दा उठाया है। उन्होंने सामाजिक वानिकी विभाग बदायूं की प्रभागीय निदेशक से मुलाक़ात कर उन्हें एक पत्र सोंपकर आग्रह किया है कि इस मेले में किसी भी प्रकार के वन्यजीवों को लाने पर पूरी तरह रोक लगाई जाए, ताकि मानव जीवन और वन्यजीव दोनों सुरक्षित रह सकें।
अपने पत्र मे विकेंद्र शर्मा ने कहा है कि मेला ककोड़ा हर साल लाखों श्रद्धालुओं और ग्रामीणों की भीड़ को आकर्षित करता है, और इस दौरान कुछ सपेरे या मदारी सांप, बंदर, नेवले या अन्य वन्य जीव लेकर आते हैं। ऐसे में भीड़ के बीच इन जीवों को लाना न केवल मानव जीवन के लिए खतरा है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 का उल्लंघन भी है।
उन्होंने पत्र में उल्लेख किया कि दो वर्ष पूर्व इसी मेले में एक व्यक्ति की सर्पदंश से मौत हो चुकी है, जो इस तरह की लापरवाही का भयावह परिणाम था।
विकेंद्र शर्मा ने यह भी कहा कि —“सपेरे अक्सर सांप के दांत तोड़ देते हैं ताकि वह किसी को नुकसान न पहुंचा सके, लेकिन इस क्रूरता से सांप खाने-पीने में असमर्थ हो जाता है और कुछ ही दिनों में उसकी मौत हो जाती है। यह न केवल कानूनन अपराध है बल्कि पशु क्रूरता का अमानवीय उदाहरण भी है।”
उन्होंने विभाग से तत्काल प्रभाव से मेला क्षेत्र में निरीक्षण अभियान चलाने, तथा किसी भी सपेरे या मदारी को वन्य जीवों के साथ प्रवेश से रोकने की मांग की है।
साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट लिखा है कि —“अगर मेले में किसी कारणवश सपेरे या मदारी वन्यजीवों के साथ दिखाई देते हैं, तो इसे विभाग की लापरवाही या संलिप्तता माना जाएगा।”
यह पत्र भारतीय जीव-जंतु कल्याण बोर्ड के जिलाध्यक्ष – पीपल फॉर एनिमल्स बदायूं एकविस्ट के रूप में विकेंद्र शर्मा द्वारा दिया गया है।
उन्होंने इसकी प्रतिलिपि जिलाधिकारी बदायूं, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक तथा मुख्य वन संरक्षक लखनऊ को भी भेजी है।
पत्र में यह भी उल्लेख है कि यदि विभाग समय रहते सख्ती नहीं दिखाता, तो मेला स्थल पर अनियंत्रित स्थिति उत्पन्न हो सकती है और इससे न केवल आमजन बल्कि वन्य जीव भी संकट में पड़ सकते हैं।
स्थानीय पशु प्रेमियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने विकेंद्र शर्मा की इस पहल की सराहना की है और कहा है कि ऐसी सतर्कता प्रशासनिक स्तर पर हर धार्मिक और पारंपरिक मेले में आवश्यक है, ताकि परंपरा के साथ-साथ मानवीय और पर्यावरणीय मूल्यों की भी रक्षा हो सके।


























