बिल्सी। नगर के सिद्धपीठ श्रीबालाजी धाम के महंत मटरुमल शर्मा महाराज जी के पावन सान्निध्य एवं तत्वावधान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का छठा दिवस मंगलवार को भव्यता और भक्तिभाव से सम्पन्न हुआ। जहां जगतगुरु रामानुजाचार्य श्रीरामचन्द्राचार्य जी महाराज के मुखारविंद से अमृतमयी कथा का श्रवण भक्तजन कर रहे हैं।

श्रीरामचन्द्राचार्य जी महाराज ने आज भगवान श्रीकृष्ण के अपने धाम गमन और पांडवों के विरक्त जीवन का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया उन्होंने बताया कि ज़ब भगवान श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध उपरांत पांडवों और सम्पूर्ण पृथ्वी के कल्याण हेतु द्वारका लौटे, तो वहां अपार हर्ष और आनंद का वातावरण छा गया। द्वारकावासी अपने प्रियतम प्रभु के दर्शन कर धन्य हो उठे। कुछ समय बाद प्रभु ने अपने जीवन की दिव्य लीला का समापन किया और अपने नित्यधाम, गोलोक वृंदावन को पधार गए।ज़ब भगवान के धाम गमन की खबर अर्जुन को प्राप्त हुई, तो उनका हृदय व्यथित हो उठा। वे गहन निराशा और दुःख से भरकर हस्तिनापुर लौटे। युधिष्ठिर ने जब अर्जुन से उनके इस विचलित भाव का कारण पूछा, तब अर्जुन ने करुण स्वर में कहा—“भैया! जिन भगवान की कृपा से हम आज इस राज्य को भोग रहे हैं, जिन्होंने हमें जीवन की हर कठिनाई में विजयश्री प्रदान की… वही भगवान श्रीकृष्ण हमें छोड़कर अपने धाम को चले गए हैं।”

यह सुनकर पांडवों का हृदय शोक और विरक्ति से भर गया। उन्हें संसार की सारी वैभव-संपत्तियाँ तुच्छ लगने लगीं। उन्हें स्पष्ट हो गया कि प्रभु की उपस्थिति ही जीवन का वास्तविक आधार है, और बिना प्रभु के यह संसार शून्य है।इसी भावना से प्रेरित होकर पांडवों ने धर्मराज युधिष्ठिर के राज्यत्याग का निर्णय लिया। उन्होंने अपने पौत्र परीक्षित का भव्य राजाभिषेक कर, हस्तिनापुर का भार उसके सुपुर्द किया। इसके बाद पांडव अपने जीवन के अंतिम तीर्थयात्रा हेतु हिमालय की ओर, देवभूमि उत्तराखंड की पावन वादियों की ओर प्रस्थान कर गए।यात्रा के दौरान एक-एक कर सभी पांडवों ने अपने प्राणों का परित्याग किया और दिव्य लोक को प्राप्त हुए। अंततः धर्मराज युधिष्ठिर, जो धर्म के साक्षात स्वरूप थे, अपने शरीर सहित स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए।

स्वामी जी ने कथा प्रेमियों से कहा कि यह प्रसंग केवल त्याग और वैराग्य की गाथा नहीं, बल्कि इस सत्य का उद्घोष है कि संसार में चाहे कितनी भी ऐश्वर्य-संपत्ति हो, यदि भगवान का सान्निध्य न हो, तो सब व्यर्थ है। प्रभु ही जीवन का परम आधार हैं। प्रसंग को सुनकर सब कथा प्रेमी भाव विभोर हो गए,

कथा सुनने के लिए अपार जनसैलाब उमड़ा रहा है। कथा सुनने के लिए न सिर्फ बिल्सी बल्कि गाजियाबाद, नोएडा, बरेली, मुरादाबाद, कासगंज, एटा, बहेड़ी, दादरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर और गजरौला से भी भक्तगण कथा श्रवण हेतु बिल्सी पहुँच रहे हैं।

आज कथा के अवसर पर महंत मटरुमल शर्मा महाराज, संजीव शर्मा, यश भारद्वाज, रीनू शर्मा, दीपक माहेश्वरी बाबा, स्वतंत्रा राठी, पुष्कीन गांधी, चारु सोमानी,जितेंद्र वार्ष्णेय, रंजन माहेश्वरी, मुकेश गुप्ता, सुभाषचंद्र बाहेती, कपिल माहेश्वरी, रवि वार्ष्णेय, दिलीप शर्मा, राधेश्याम शर्मा, शरद माहेश्वरी, सोमेंद्र सोम तोषनीवाल, सौरभ सोमानी, दीपु माहेश्वरी, रोहित शर्मा, कंटू माहेश्वरी, देव वार्ष्णेय, राजेश माहेश्वरी, प्रवीण वार्ष्णेय, मोहित देवल, विशाल भारत खासट, डॉ राजाबाबू वार्ष्णेय, आशीष वशिष्ठ, हेमचंद्र वशिष्ठ, गोरेलाल शर्मा, आचार्य कुलदीप शर्मा, संदीप माहेश्वरी, लोकेश कुमार, अनुप माहेश्वरी, आशा शर्मा, भुवनेश शर्मा, सुवीन माहेश्वरी, राजीव माहेश्वरी, निशांत, टिंकू वार्ष्णेय, नीरज माहेश्वरी, आशा माहेश्वरी, सरिता माहेश्वरी, अनीता माहेश्वरी, सचिन माहेश्वरी, सुनील माहेश्वरी समेत सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।

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