बदायूं। सरकारी धन के गबन के एक गंभीर मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) तौसीफ रजा ने तत्कालीन जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) श्रेया मिश्रा सहित चार लोगों पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है। यह मामला फैजगंज बेहटा थाना क्षेत्र के पिसनहारी गांव का है, जहां ग्राम पंचायत के धन के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया।
ग्राम पंचायत सदस्य की याचिका से खुलासा
ग्राम पंचायत सदस्य रेनू यादव ने अपने अधिवक्ता मुकेश बाबू के माध्यम से सीजेएम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि गांव की प्रधान ओमवती और उनके पति ऋषिपाल सिंह यादव ने मिलकर पंचायत के धन का गबन किया। जांच में पाया गया कि श्रमिकों के लिए आवंटित 1 लाख 56 हजार 550 रुपये का दुरुपयोग कर यह धनराशि प्रधानपति ने अपने खाते में ट्रांसफर करवा ली, लेकिन श्रमिकों को इसका भुगतान नहीं किया गया।
जांच में अधिकारियों की मिलीभगत उजागर
जिला विकास अधिकारी (डीडीओ) की 23 अक्टूबर 2023 की रिपोर्ट में इस घोटाले का जिक्र किया गया था। जांच में यह बात भी सामने आई कि गबन में तत्कालीन ग्राम पंचायत सचिव स्वर्णकेस और तत्कालीन डीपीआरओ श्रेया मिश्रा की भी संलिप्तता रही। दोनों पर पेमेंट बाउचर की डिटेल्स में हेरफेर कर फर्जीवाड़ा करने का आरोप है।
सीजेएम कोर्ट का आदेश और पुलिस की कार्रवाई
सीजेएम तौसीफ रजा ने इस मामले को गंभीर मानते हुए फैजगंज बेहटा थाना प्रभारी को आदेशित किया कि श्रेया मिश्रा, स्वर्णकेस, ओमवती और ऋषिपाल सिंह यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर विवेचना शुरू करें। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि रिपोर्ट की कॉपी न्यायालय में प्रस्तुत की जाए और मामले की गहराई से जांच की जाए।
प्रशासन और जनता में हड़कंप
कोर्ट के इस आदेश के बाद प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है। इस मामले ने सरकारी धन के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की परतें खोल दी हैं। जनता में इस बात को लेकर आक्रोश है कि प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत के कारण गरीब श्रमिकों के लिए आवंटित धन का गबन हुआ।
न्याय की उम्मीद में ग्राम पंचायत सदस्य
ग्राम पंचायत सदस्य रेनू यादव ने कहा कि यह मामला श्रमिकों के अधिकारों से जुड़ा है और न्याय पाने के लिए उन्होंने कोर्ट का सहारा लिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस गबन में शामिल सभी दोषियों को सजा मिलेगी और गबन की गई राशि को श्रमिकों तक पहुंचाया जाएगा।
यह मामला न केवल ग्राम पंचायत की वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खडे करता है।


























