सड़क निर्माण के लिए गुहार लगाने के बावजूद दो दर्जन गांवों के लोग सुविधाओं से वंचित


बदायूं | आजादी के 78 साल बाद भी दो तहसीलों को जोड़ने वाला बिल्सी-सहसवान मार्ग वाया नैथुआ अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। इस मार्ग की जर्जर हालत का आलम यह है कि यहां स्थित दो दर्जन से अधिक गांवों के लोग आज भी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। 17 किलोमीटर लंबे इस मार्ग का डामरीकरण कराने के लिए ग्रामीणों ने हर चुनाव में जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्हें केवल आश्वासन ही मिला।
स्वदेश केसरी के तहसील प्रभारी ललित वार्ष्णेय ने ग्राउंड जीरो पर जाकर इस मार्ग की दयनीय स्थिति का जायजा लिया। ग्रामीणों ने बताया कि इस जर्जर मार्ग पर स्थित गांवों में खेतों की रजिस्ट्री का सर्किल रेट सामान्य है, जबकि सुविधाओं के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है। असबार नदी पर 20 मीटर लंबा पुल भी बन चुका है, लेकिन सड़क निर्माण का प्रस्ताव कई बार भेजने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
इस मार्ग पर ग्राम अहमदनगर असोली, मिर्जापुर शोहरा, नैथुआ महमूदपुर सराय समेत कई गांवों के लोग बिल्सी या सहसवान जाने के लिए उबड़-खाबड़ गड्ढों से होकर गुजरने को मजबूर हैं। वर्ष 1992 में इसी जर्जर मार्ग पर भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने साधु पन्नालाल परमार्थ महाविद्यालय का शिलान्यास किया था, जो अब एक इंटरमीडिएट कॉलेज के रूप में संचालित हो रहा है। लेकिन 32 वर्षों बाद भी इस मार्ग की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।
स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान इसी इंटरमीडिएट कॉलेज की प्रबंध समिति ने भारतीय जनता पार्टी के विधायक हरीश शाक्य का ध्यान इस जर्जर मार्ग की ओर दिलाया था। अब देखना यह है कि इस मार्ग का निर्माण कब तक पूरा होगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

























