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अदालत में मौजूद वह बंदर कौन था?अयोध्या फैसले के वक्त जज को भी करना पड़ा था ‘प्रणाम’1991 में छपी अपनी आत्मकथा ‘Voice of Conscience’में किया है इसका ज़िक्र,

अयोध्या के राम मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की तारीख 22 जनवरी जैसे जैसे नज़दीक आ रही है वैसे वैसे राम मंदिर से जुड़े तमाम किस्से सामने आ रहे हैं ,ऐसा ही एक किस्सा उस बन्दर से जुड़ा हुआ है जो अयोध्या फैसले के वक्त कोर्ट में मौजूद था.

दरअसल, 1 फरवरी 1986 की शाम 4.40 बजे उस वक्त के जिला जज कृष्ण मोहन पांडे ने विवादित मस्जिद का ताला खोलने का आदेश दिया था. जब जज साहब फैसला पढ़ रहे थे, तब वह काला बंदर चुपचाप बैठा था. फैसले के बाद ही उस काले बंदर को वहां से जाते देखा गया था.

अयोध्या में सालों तक टेंट में रहने वाले रामलला अब अपने भव्य राम मंदिर में विराजेंगे. 22 जनवरी को रामभक्तों का इंतजार खत्म हो रहा है. इसी दिन रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा होगी. अयोध्या में राम मंदिर बनने की पटकथा काफी उलझी रही है. कानूनी जंग दशकों तक चली. जिला अदालत से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया. और आखिरकार रामभक्तों के पक्ष में फैसला आया. 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता प्रशस्त हुआ. विवादित ढांचा (बाबरी मस्जिद) से लेकर भव्य राम मंदिर बनने तक के सफर में एक काले रंग के बंदर की भूमिका को भी कुछ लोग दैवीय शक्ति मानते हैं. आज उसी बंदर की कहानी, जिसे देखकर जज साहब ने भी हाथ जोड़ लिए थे.

हर जगह देखा गया था वह बंदर
1 फरवरी 1986 को अयोध्या की सुबह कुछ अलग थी. उस दिन न केवल अयोध्यावासी बल्कि देश-दुनिया की नजर फैजाबाद जिला अदालत के फैसले पर टिकी थी. सुबह से ही लोग अदालत पहुंचने लगे थे और फैसला सुनने को बेताब थे. पुलिस-प्रशासन से लेकर आम लोगों की मौजूदगी से अदालत में पैर रखने की जगह नहीं थी. खचाखच भीड़ में अदालत में मौजूद लोगों की नजर एक काले रंग के बंदर पर टिकी थी, जो फैसले के वक्त वहीं मौजूद था. दावा किया जाता है कि वह बंदर अदालत में सुनवाई शुरू होने से लेकर जिला जज केएम पांडे यानी कृष्ण मोहन पांडे के घर जाने तक हर जगह देखा गया था.

‘दैवीय बंदर’ ने कुछ भी नहीं खाया
1 फरवरी 1986 की शाम 4.40 बजे उस वक्त के जिला जज कृष्ण मोहन पांडे ने विवादित मस्जिद का ताला खोलने का आदेश दिया था. जब जज साहब फैसला पढ़ रहे थे, तब वह काला बंदर चुपचाप बैठा था. फैसले के बाद ही उस काले बंदर को वहां से जाते देखा गया था. उस वक्त के जिला जज केएम पांडे ने 1991 में छपी अपनी आत्मकथा ‘Voice of Conscience’ में लिखा है, ‘जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैगपोस्ट को पकड़ कर बैठा रहा. वे लोग जो फैसला सुनने के लिए अदालत आए थे, उस बंदर को फल और मूंगफली देते रहे पर बंदर ने कुछ न छुआ और न खाया. चुपचाप बैठा रहा. मेरे आदेश सुनाने के बाद ही वहां से गया. फैसले के बाद जब डीएम और एसएसपी मुझे मेरे घर पहुंचाने आए तो मैंने उस बंदर को अपने घर के बरामदे में बैठा पाया. मुझे आश्चर्य हुआ. मैंने उसे प्रणाम किया. वह कोई दैवीय ताकत थी.’ पत्रकार हेमंत शर्मा ने भी इसका जिक्र किया है.

आदेश के वक्त चुपचाप था बंदर
फैसले वाले दिन जिला जज केएम पांडे के साथ करीब-करीब पूरा दिन बिताने वाले फैजाबाद के तत्कालीन सीजेएम सीडी राय भी इस बात की पुष्टि करते हैं. उनका भी कहना है कि फैसले वाले दिन सुनवाई शुरू होने से पहले एक बंदर अदालत में लगने वाले झंडे को पकड़े खड़ा रहा. जज साहब जब अदालत में दाखिल हुए तो उनकी नजर उस काले रंग के बंदर पर पड़ी और उसे भगाने की कोशिश भी हुई, मगर वो बंदर वहीं झंडा पकड़े खड़ा रहा. रिटायर जज पांडे उस काले बंदर को कोई दैवीय शक्ति मानते हैं और उन्हें लगता है कि कुछ हद तक उनके फैसले को उस बंदर ने जरूर प्रभावित किया. जब फैसले वाले दिन वह घर गए थे तो उस कोर्ट रूम वाले काले बंदर को देखकर वह हतप्रभ थे. हालांकि, उन्होंने उसे कोई दैवीय शक्ति मानकर प्रणाम किया था. हालांकि, ऐसा दावा किया जाता है कि फैसला सुनने और ताला खुलने के बाद उस काले बंदर को कहीं नहीं देखा गया.

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