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बदायूँ के जिला पशु चिकित्सालय में बेजुवानो की जिंदगी के साथ किया जा रहा खिलवाड़,थक हार कर प्रशासन के लोग भी मदद के लिये बुलाते हैं पशुप्रेमी विकेंद्र शर्मा को,


बदायूँ जिले में पशुचिकित्सकों का हाल बहुत बुरा है। चिकित्सालय में तैनात चिकित्सक बेजुवानो की जिंदगी के साथ लगातार खिलवाड़ करते नजर आते हैं। इलाज़ के नाम पर सिर्फ खाना पूर्ति होती है। क्या आम क्या खास पशुओं के इलाज के लिए जरा जरा सी दवाइयां तक बाहर से लेनी पड़ती है। किसी भी बीमार पशु का तापमान चेक किये बिना ही इंजेक्शन लगा दिए जाते है। पूछ्ने पर थरमामीटर नहीं होना बता कर टरका दिया ।

एक ताजा घटना बताते चलें जिससे चिकित्सालय के हालात कितने खराब है पता चलता है, बंदर का एक बच्चा पुलिस लाइन में काफी ऊंचे पेड़ से नीचे गिर जाता है, जिस वजह से वो चल नही पा रहा था, पुलिस लाइन से कॉल पशु चिकित्सालय को न जाकर विकेंद्र शर्मा को किया गया,विकेंद्र शर्मा किसी अन्य पशु के इलाज के लिये शहर से दूर थे उन्होंने सलाह दी कि पशु डॉक्टर को बुला कर दर्द और ताकत का इंजेक्शन लगवा दीजिये,पशु चिकित्सक को पुलिसवालों ने कॉल किया तो उन्होंने उपचार देने की जगह ज्ञान दे दिया कि वन विभाग को कॉल करो वो लेके जाएंगे, पुलिसवालों ने वन विभाग को कॉल की तो उन्होंने कहा आज टीम बाहर है आप विकेंद्र को कॉल कर लीजिए वो ले जाएंगे।पशु चिकित्सक को प्राथमिक उपचार देना चहिये था उन्होंने टाल दिया। वन विभाग को पशु चिकित्सक को कॉल करके उसका उपचार कराना था उन्होंने भी टाल दिया। फिर काम करे कौन?लौट के कॉल आया विकेंद्र के पास, विकेंद्र ने शहर में आते ही पुलिस लाइन जाकर बन्दर के बच्चे का इलाज शुरू कर दिया, सरकार से लाखों रुपये तनख्वाह लेने वाले ,व लाखों रुपये महीने का दबाइयाँ के बजट आबंटन के बाबजूद बदायूँ में बेजुबानों को कोई लाभ नहीं होता,गौशालाओ में बड़े जानवर जो खाने पीने में असमर्थ होते हैं उनका इलाज बिना ग्लूकोस दिए ही किया जाता है, ग्लूकोस देना भी पड़े तो ग्लूकोस के नाम पर सिर्फ एक आधा लीटर ग्लूकोस दिया जाता है। अब इंसान और इन जानवरो के लिए ग्लूकोस की मात्रा में तो फर्क होगा ही, पर यहां उनका इलाज नाम के लिए किया जाता है। पशु चिकित्सालय में हो रही लापरवाही पर मुख्य पशु चिकित्साधिकारी का कोई ध्यान नहीं है।
आवारा जानवरों के इलाज के लिये कोई दयावान व्यक्ति मानवता के नाते पशुचिकित्सालय लेकर आ गया तो पशु चिकित्सालय में मौजूद डॉक्टर व स्टाफ का रवैया बिल्कुल सरकारी वाला ही रहता है जिसके कारण पशुओं के प्रति दयाभाव दिखाने वाले हर व्यक्ति सरकार की व्यवस्था को कोसते हुए चला जाता है।जिसके चलते बेजुबान तड़प तड़प कर अपनी जान दे देता है,काश लोकतंत्र में इन बेजुबानो का भी वोट होता तो इनके लिये भी कोई ठोस नीतियां बनती,पर इनके दर्द का निवारण के नाम पर सरकारी दामाद बन मौज उड़ा रहे ,अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा दें तो इन बेजुबानो की दुआएं भी मिलेंगी।
बड़ा सवाल उठता है विकेंद्र को इसके बदले मिलता क्या है न कोई सरकारी मदद, न कोई सामाजिक सहायता,अपने पेट्रोल से घटना स्थल तक जाकर पशुओं की मदद करना,उनकी दवाई,उनके खाने पीने का खर्च,इन बीमार पशुओँ को रखने के लिये स्थान की व्यवस्था क्या यह सब बिना पैसे के सम्भव है,
समाज के गिने चुने समाज सेवी यदा कदा विकेंद्र के कार्यों से प्रभावित होकर दवाइयों में सहयोग कर देते हैं, कुछ सँस्था बुलाकार एक मेडल एक प्रशस्ति पत्र देकर सम्मान कर देते हैं क्या कभी किसी ने सोचा है कि विकेंद्र शर्मा (वेरोजगार व्यक्ति) किसी का फोन आने पर बेजुबानों की मदद के लिये जब घटना स्थल तक जाता है तो आने जाने में होने वाला खर्च कहाँ से आता है,दुख तो तब होता है जब इन बेजुबानों की सेवा करने के कारण, शहर का एक प्रतिष्ठित स्कूल विकेंद्र को अपने यहां से निकाल कर उसे बेरोजगार कर देता है,क्या कभी हम लोगों ने सोचा है कि बेजुबानो का दर्द दूर करने वाले विकेंद्र को इनका दर्द दूर करने के लिये पैसों की किल्लत के चलते निजी जिंदगी में कितने दर्द सहने पड़ते हैं, सवाल स्वदेश केसरी का जब देना है शासन प्रशासन व बदायूँ की जनता को ?? आखिर इन बेजुबानो की मदद बेरोजगार विकेंद्र करे तो करे कैसे,

जिले के पशुप्रेमियों ने मीडिया के माध्यम से जिलाधिकारी बदायूँ से अपील करते हुए बेजुबानों को मिलने वाली सरकारी सेवाओं को दुरुस्त कराए जाने की मांग की है।

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