इटावा। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में कथावाचक की पिटाई मामले ने अब जातीय और राजनीतिक रंग ले लिया है। जहां एक ओर यादव समाज के हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं, वहीं दूसरी ओर ब्राह्मण संगठनों ने भी मोर्चा खोल दिया है। मामला केवल कथावाचक की पिटाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक हस्तक्षेप से यह बेहद संवेदनशील होता जा रहा है। आने वाले विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए अवसर भी बन सकता है और चुनौती भी।

घटना की जड़ – 22 जून की रात

दादरपुर गांव में 22 जून की रात कथावाचक मुकुट मणि यादव और उनके दो साथियों की गांव के कुछ ब्राह्मण समुदाय के लोगों द्वारा कथित पिटाई की गई थी। मामला गर्माया तो इंडियन रिफॉर्म्स ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष गगन यादव ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उन्होंने 26 जून को सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ इटावा कूच की घोषणा कर दी। पुलिस ने उन्हें नजरबंद कर दिया, जिसके विरोध में गुरुवार को 2,000 से अधिक लोगों ने इटावा में प्रदर्शन किया।

थाना घेराव और पथराव

प्रदर्शनकारियों ने अहीर रेजिमेंट और यादव संगठनों के बैनर तले थाना घेराव किया। जब पुलिस ने उन्हें समझाने का प्रयास किया तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। पुलिस पर पथराव किया गया, सरकारी गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया गया। हालात बिगड़ते देख पुलिस ने 12 थानों की फोर्स बुलाई। मौके पर पहुंचे इंस्पेक्टर ने पिस्टल निकालकर भीड़ को खदेड़ा। दावा किया गया कि पुलिस ने हवाई फायरिंग भी की। 12 लोगों को हिरासत में लिया गया और आसपास के गांवों में सर्च ऑपरेशन चलाया गया।

FIR दो तरफा – मामला और पेचीदा

मामले को तब और मोड़ मिला जब पुलिस ने कथावाचक मुकुट मणि यादव और उनके साथी संत कुमार यादव पर भी गंभीर धाराओं में FIR दर्ज की। एक महिला ने कथावाचकों पर छेड़छाड़, गलत पहचान और धार्मिक भावनाएं भड़काने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप यह भी है कि कथावाचक ने अपनी जाति छिपाकर गांव में भ्रम फैलाया।

ब्राह्मण महासभा ने उठाई आवाज

ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अरुण दुबे के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने एसएसपी से मिलकर कथावाचकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर जल्द न्याय नहीं मिला तो आंदोलन होगा। महिला शिकायतकर्ता रेनू तिवारी ने कथावाचक पर झूठ बोलने और अभद्र व्यवहार का आरोप लगाया।

राजनीतिक रंगत – अखिलेश यादव की एंट्री

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने घटना के अगले ही दिन कथावाचक और उनके साथियों को लखनऊ बुलाया, उन्हें ढोलक, हारमोनियम और नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया। उन्होंने इसे “प्रभुत्ववाद बनाम सामाजिक न्याय” का मसला बताया और कहा कि कुछ ताकतें जातीय वर्चस्व थोपना चाहती हैं।

राजनीतिकरण से मामला और उलझा

इस घटना ने विभिन्न राजनीतिक दलों को एक नया मुद्दा थमा दिया है। एक ओर सपा यादव समाज के समर्थन में खुलकर सामने आ गई है, वहीं दूसरी ओर ब्राह्मण संगठन भाजपा के नजदीक देखे जा रहे हैं। इस तनावपूर्ण स्थिति का असर इटावा सहित आस-पास की विधानसभा सीटों पर 2027 के चुनाव में देखने को मिल सकता है।

सोशल मीडिया पर बंटा जनमत

सोशल मीडिया पर भी लोग दो पक्षों में बंट गए हैं। जहां कुछ कथावाचक के साथ हुई मारपीट की निंदा कर रहे हैं, वहीं कुछ महिला के आरोपों के बाद कथावाचकों की भूमिका को भी कटघरे में रख रहे हैं। लोगों का कहना है कि कानून को काम करने देना चाहिए, ना कि भीड़ को फैसला करना।

निष्कर्ष:
इटावा की यह घटना अब केवल कानूनी मुद्दा नहीं रही, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी विस्फोटक बन चुकी है। एक तरफ जातीय तनाव, दूसरी तरफ राजनीतिक लाभ-हानि की गणना। देखने वाली बात होगी कि पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई कर पाती है या मामला राजनीतिक लाभ की भेंट चढ़ जाता है।

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