






बदायूं/नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर बड़े सामाजिक-राजनीतिक सवालों का केंद्र बन गया। आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और आर्थिक आधार पर समान अवसर की मांग को लेकर हुए ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ में बदायूं जिले से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। इनमें उझानी से भाजपा नेता संजीव गुप्ता सहित चार लोग शामिल रहे, जबकि बदायूं जिले से सेकड़ों की संख्या मे लोगों के दिल्ली पहुंचने की बात सामने आई है।आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं ने विवाद को और तेज कर दिया।
आंदोलन में उझानी से भाजपा नेता संजीव गुप्ता के साथ अमित प्रताप सिंह, पंडित किशन शर्मा और कुलदीप शर्मा पहुंचे थे। वहीं आंवला से अभय प्रताप सिंह तथा इस्लामगंज से सचिन गुप्ता, श्याम गुप्ता, शिवम गुप्ता सहित अन्य लोग भी आंदोलन में शामिल हुए। सभी लोग देर रात वापस लौट चुके हैं।
नाश्ता कर रहे थे, तभी पहुंची भारी पुलिस फोर्स
उझानी से दिल्ली गए लोगों के मुताबिक उनका प्रयास था कि आंदोलन में लगातार मौजूद रहकर आंदोलन को मज़बूती प्रदान करते हुए सरकार के सामने अपनी बात रखी जाए। उनका कहना है कि शाम के समय जब प्रदर्शनकारी नाश्ता कर रहे थे, उसी दौरान भारी संख्या में पुलिस बल मौके पर पहुंचा और प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए लाठी चार्ज करते हुए लोगों को हिरासत में लेने की कार्रवाई शुरू कर दी गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार पुलिस कार्रवाई से अफरा-तफरी मच गई। कुछ युवा और छात्र अचानक बने हालात से घबराकर वहां से चले गए, जिससे पुलिस भीड़ को तितर-बितर करने में सफल रही। दिल्ली में प्रदर्शन को लेकर पहले से ही पुलिस की ओर से अनुमति नहीं होने की बात कही गई थी और मौके पर भारी पुलिस बल व अर्धसैनिक बल तैनात किया गया था।
संजीव गुप्ता बोले—पार्टी से ऊपर समाज
दिल्ली से वापस लौटने के बाद भाजपा में विभिन्न महत्वपूर्ण दायित्व निभा चुके संजीव गुप्ता ने ‘स्वदेश केसरी’ से बातचीत में आंदोलन को लेकर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि उनके लिए पार्टी से पहले समाज है और यदि समाज से जुड़े गंभीर सवालों पर आवाज नहीं उठाई जाएगी तो आने वाले समय में परिस्थितियां और जटिल हो सकती हैं।
संजीव गुप्ता ने कहा, “मैंने अपने जीवन के करीब 25 वर्ष संघ और भाजपा को दिए हैं। बजरंग दल में जिला संयोजक, धर्म जागरण विभाग में विभाग संयोजक, विद्यार्थी परिषद में दायित्व, संघ में सह कार्यवाह और नगर कार्यवाहक सहित संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई हैं।”
उन्होंने संगठन की वर्तमान कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले भाजपा संगठन और कार्यकर्ताओं की बात करती थी, लेकिन अब उन्हें लगता है कि धनबल और दल-बदल की राजनीति को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। उनके मुताबिक वर्षों तक संगठन के लिए काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं के मन में असंतोष है।
उन्होंने कहा कि “हमने पैसा, समय और जवानी संगठन को दी है। यदि व्यवस्था बदल रही है तो हमें भी समाज के सवालों पर अपनी बात रखने के लिए कुछ नया करना पड़ेगा।”
‘आरक्षण व्यवस्था समाज और देश को अंदर से कमजोर कर रही’
संजीव गुप्ता ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए और जरूरतमंदों तक लाभ पहुंचाने के लिए आर्थिक आधार को प्रमुखता दी जानी चाहिए न कि जाति आधारित । उन्होंने इसे समाज और देश के लिए गंभीर समस्या बताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर व्यापक बहस जरूरी है।
हालांकि, आरक्षण का मुद्दा संवैधानिक और बेहद संवेदनशील विषय है। दूसरी ओर, इसी दौरान आरक्षण के समर्थन में भी आवाजें उठी हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान समेत कई नेताओं ने आरक्षण को वंचित वर्गों का संवैधानिक अधिकार बताया है।
क्या यह सिर्फ आरक्षण का मुद्दा है या जनता के भीतर बढ़ते असंतोष की आहट?
दिल्ली के इस आंदोलन को केवल आरक्षण के सवाल तक सीमित करके देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा। प्रदर्शन में शामिल लोगों की नाराजगी के पीछे बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली, पेपर लीक, महंगाई, सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे भी चर्चा में हैं। हाल के दिनों में पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवाओं के आंदोलनों ने भी सरकारों के सामने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
सवाल यह है कि यदि युवा पढ़ाई करे, परीक्षा दे और उसके बाद पेपर लीक या चयन प्रक्रिया पर सवाल उठें तो उसका भविष्य किसके भरोसे रहेगा?
महंगाई भी बन रही बड़ा राजनीतिक सवाल
दूसरी ओर आम आदमी के सामने रोजमर्रा की महंगाई लगातार चुनौती बनी हुई है। चीनी और खाद्य वस्तुओं की कीमतों से लेकर पेट्रोल-डीजल, घरेलू खर्च, शिक्षा और स्वास्थ्य तक बढ़ती लागत ने परिवारों के बजट को प्रभावित किया है।
पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को लेकर भी समय-समय पर वाहन चालकों की ओर से सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में सरकार के सामने यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ईंधन नीति से उपभोक्ता को वास्तविक लाभ कितना मिला और वाहन संबंधी शिकायतों की स्थिति क्या है।
‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के नारे पर भी उठ रहे सवाल
सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ जैसे नारों के माध्यम से अपनी प्रतिबद्धता जताई थी। लेकिन हजारों करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रहे एक्सप्रेसवे, नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे, कॉरिडोर, पुल, रेलवे परियोजनाओं और अन्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों में निर्माण गुणवत्ता को लेकर सामने आने वाले वीडियो और तस्वीरें सरकार के लिए असहज सवाल खड़े करती हैं।
कहीं सड़क धंसने, कहीं पुल के हिस्से को नुकसान पहुंचने, कहीं जलभराव में सड़क डूबने तो कहीं निर्माण के तुरंत बाद गुणवत्ता पर सवाल उठने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब जनता के हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं तो निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
क्या ठेकेदारों, अधिकारियों और निगरानी तंत्र की जवाबदेही तय हो रही है? क्या दोषी पाए जाने वालों पर ऐसी कार्रवाई हो रही है जिससे भविष्य में कोई सरकारी परियोजना भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़े?
सरकार के लिए ‘खतरे की घंटी’ या लोकतांत्रिक असहमति की आवाज?
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो किसी भी सरकार के लिए जनता के विभिन्न वर्गों में बढ़ता असंतोष चेतावनी का संकेत हो सकता है। उपचुनावों के नतीजों के बाद भी यदि बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, भर्ती परीक्षाओं और सामाजिक नीतियों को लेकर उठ रहे सवालों का समय रहते समाधान नहीं हुआ तो आने वाले समय में इसका राजनीतिक असर देखने को मिल सकता है।
हालांकि, इसे सीधे किसी एक दल के खिलाफ जनादेश मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन भाजपा के भीतर से ही लंबे समय से जुड़े कार्यकर्ताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से असंतोष व्यक्त किया जाना निश्चित रूप से संगठन के लिए विचार का विषय है।
लाठीचार्ज से सवाल और गहरे हुए
आंदोलन के दौरान पुलिस की कार्रवाई ने भी विवाद को बढ़ा दिया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने अनावश्यक बल का प्रयोग कर भीड़ को हटाया और सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया। वहीं पुलिस का पक्ष है कि प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर पर अनुमति नहीं थी और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज को किस सीमा तक और किस तरीके से सुना जाए? यदि प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखना चाहते हैं तो उनके लिए निर्धारित स्थान और संवाद का रास्ता होना चाहिए, वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की है।
बदायूं से दिल्ली तक पहुंची आवाज
उझानी और बदायूं से लोगों का दिल्ली पहुंचना इस पूरे घटनाक्रम का स्थानीय पहलू है। खास बात यह है कि इनमें लंबे समय से भाजपा और संघ से जुड़े रहे संजीव गुप्ता जैसे कार्यकर्ता भी शामिल हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपना बड़ा जीवन संगठन को दिया है और अब समाज से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज उठाना उनका अधिकार है।
अब देखना यह होगा कि दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी यह आवाज कितने समय तक बनी रहती है और क्या सरकार इसे केवल एक आंदोलन मानकर नजरअंदाज करती है या आरक्षण, भर्ती व्यवस्था, महंगाई, भ्रष्टाचार और इंफ्रास्ट्रक्चर की गुणवत्ता जैसे सवालों पर ठोस कदम उठाती है।
क्योंकि सवाल केवल आरक्षण का नहीं है—सवाल उस भरोसे का है जो आम जनता अपने वोट से सरकार को देती है।

























