बदायूं। भारतीय जनता पार्टी में इन दिनों अंदरूनी कलह अपने चरम पर दिखाई दे रही है। ऊपर से संगठन एकजुट नजर आता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। पार्टी के भीतर गुटबाजी, शीत युद्ध और आपसी खींचतान लगातार गहराती जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते इस अंदरूनी बीमारी का इलाज नहीं किया गया, तो आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा भाजपा को फिर भुगतना पड़ सकता है।

बदायूं जनपद में भाजपा की लगातार कमजोर होती स्थिति को इसी अंदरूनी कलह का नतीजा बताया जा रहा है। लोकसभा चुनाव में हार, शेखूपुर और बिसौली विधानसभा सीटों का नुकसान, साथ ही नगर निकाय चुनावों में अधिकांश चेयरमैन पदों पर पराजय—इन सभी परिणामों को पार्टी के भीतर चल रहे गुटीय संघर्ष से जोड़कर देखा जा रहा है।

इसी सियासी खींचतान की एक और बानगी उस समय सामने आई, जब उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कल्याण सिंह की 94वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ा राजनीतिक संदेश देने वाली घटना सामने आई।

कल्याण सिंह जयंती पर शिलान्यास पट से दातागंज विधायक का नाम गायब, मचा सियासी बवाल

मुजरिया क्षेत्र में स्थित कल्याण सिंह स्मृति स्थल के शिलान्यास कार्यक्रम के दौरान लगी शिलापट्टिका से दातागंज विधायक राजीव कुमार सिंह का नाम गायब पाए जाने के बाद सियासी गलियारों में हलचल मच गई है। इस घटना ने भाजपा के भीतर चल रही अंतर्कलह को खुलकर उजागर कर दिया।

शिलापट पर भाजपा के कई स्थानीय और जनप्रतिनिधियों के नाम अंकित थे, लेकिन क्षेत्रीय विधायक का नाम न होना कई सवाल खड़े कर रहा है। इस चूक के बाद विधायक समर्थकों और क्षत्रिय समाज में भारी नाराजगी देखी जा रही है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

शिलापट पर जिन प्रमुख नेताओं के नाम दर्ज थे, उनमें—
भाजपा जिलाध्यक्ष राजीव कुमार गुप्ता,
जिला पंचायत अध्यक्ष वर्षा यादव,
बिल्सी विधायक हरीश शाक्य,
सदर विधायक महेश चंद्र गुप्ता,
और एमएलसी वागिश पाठक के नाम शामिल थे।

राजनीतिक संकेत और असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना केवल एक “प्रशासनिक चूक” नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर गहराते मतभेदों का संकेत है। ऐसे मामलों से न सिर्फ कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा होता है, बल्कि संगठन की एकता और चुनावी रणनीति पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

बताया जा रहा है कि यदि इस तरह की घटनाओं पर समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने ध्यान नहीं दिया, तो बदायूं जिले में भाजपा की स्थिति और कमजोर हो सकती है, जिसका असर आगामी चुनावों में साफ दिखाई दे सकता है.।

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