बदायूं। आजादी के इतिहास में कई गीत ऐसे रहे हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के खून में खौलता हुआ जोश भर दिया था। उन गीतों ने अंग्रेज़ी सत्ता की नींव तक हिला दी थी। ऐसा ही एक जीवंत राष्ट्रगीत जिसने देश के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों और आम जनता के भीतर 150 वर्ष पूर्व राष्ट्रभक्ति की चिंगारी जलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई यह गीत आज भी उतना ही जोशीला और शक्तिशाली है।

इस गीत को राष्ट्रीय गीत का दर्जा तो मिला, लेकिन राष्ट्रगान जैसा सम्मान नहीं मिल सका ? यह सवाल एक बार फिर देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है।

डॉ. उर्मिलेश शंखधार-जिनकी आवाज़ में यह गीत बन जाता था ज्वालामुखी

बदायूं के गौरव और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि स्वर्गीय डॉ. उर्मिलेश शंखधार ने इस ऐतिहासिक राष्ट्रगीत के समर्थन मे एक गीत लिखा और उस गीत को जिस जोश और ओजस्विता के साथ मंचों से गाया करते थे वह आज भी स्मृतियों में जीवित है। कवि सम्मेलनों में जब वे मंच पर खड़े होकर यह गीत गाते थे, तो पूरा सभागार खड़े होकर झूम उठता था, लोगों की आंखें गर्व और उत्साह से चमक उठती थीं,पूरे माहौल में मानो क्रांति की गूंज फैल जाती थी।उनकी ओजस्वी वाणी दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देती थी।लोग याद करते हुए कहते हैं – “उर्मिलेश जी की आवाज़ में राष्ट्र की आत्मा बोलती थी!”

आज भी यह गीत किसी भी राष्ट्रीय पर्व, विद्यालय, महाविद्यालय या साहित्यिक मंचों पर ज़ब उर्मिलेश जी की आवाज़ का ऑडियो और वीडियो मे बजता है तो लोगों मे वही जोश, वही क्रांति की लौ फिर से जगा जाता है।

150 साल पुराने गीत की प्रतिध्वनि आज भी उतनी ही प्रासंगिक क्यों?

यही वह गीत है जो 150 वर्षों से—स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरणा देता रहा,क्रांतिकारियों के लिए टॉनिक का काम करता रहा,और आज भी जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जागृत करता है।

ऐसे गीत को राष्ट्रगान जैसा सम्मान क्यों नहीं मिला, यह अब देश की जनता पूछ रही है सवाल?

इस गीत को लेकर पूर्व सरकार पर लगता था पक्षपात के आरोप… लेकिन यह भी सच है कि इसी गीत को राष्ट्रीय गीत का दर्जा भी उसी सरकार में मिला था

कुछ संगठनों और राजनीतिक पार्टियां का आरोप रहा कि पूर्ववर्ती सरकार इस गीत से कहीं न कहीं ‘दूरी’ बनाकर रखती थीं।
परंतु यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि – इस गीत को राष्ट्रगीत का दर्जा उसी सरकार द्वारा दिया गया था।

एक राजनैतिक दल द्वारा इसे राजनैतिक मुद्दा बनाया हुआ था वो जनता के बीच मे जाकर यह आरोप लगाता था कि इसको राष्ट्रगान जैसा सम्मान पूर्व सरकार द्वारा नही दिया, इसको लेकर लोगों से सहानुभूति और वोट दोनों हासिल भी किये !

विगत 11 बर्षों से भारत मे गीत के साथ भेदभाव का आरोप लगाने वाले दल की ही सरकार है वो इसको लेकर क्या कर रही है? 11 वर्ष सत्ता में बीत गए…पर अभी तक इस गीत को क्यों नहीं मिला वो राष्ट्रीय सम्मान? जिसकी वो विपक्ष मे रहकर मांग करते आ रहे थे,,

अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि—

जब वर्तमान सरकार पिछले 11 वर्षों से केंद्र की सत्ता में है, और इसके अधिकतर नेता इस गीत को विशेष श्रद्धा से जोड़ते हैं, और दावा करते रहे हैं कि एक दिन इसे राष्ट्रगान जैसा दर्जा दिलाया जाएगा…तो फिर आज तक ऐसा क्यों नहीं हुआ? सवाल तो बनता है ?

क्या यह मुद्दा—

  • मात्र जनभावना से खेलने का था?
  • या केवल चुनावी वादों में इस्तेमाल किया गया?
  • या फिर इसे सम्मान दिलाने की इच्छाशक्ति आज भी अधूरी है?

जनमानस में यह प्रश्न गूंज रहा है कि जब सब कुछ सत्ता में बैठे लोगों के हाथ में है,तो फिर यह सम्मान कब तक टलता रहेगा?

जनता की मांग स्पष्ट—150 वें वर्ष पर मिले राष्ट्रगान जैसा दर्जा

इस राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर के साहित्यकारों, देशभक्तों और युवाओं की एक ही इच्छा है—“इस गीत को वह सम्मान मिले जो इसकी असल पहचान है — राष्ट्रगान के समान सम्मान!”

बदायूं के साहित्यकार, विशेषकर डॉ. उर्मिलेश शंखधार के अनुयायियों का कहना है—”उर्मिलेश जी ने अपनी ओजस्वी आवाज़ से इस गीत को राष्ट्र की आत्मा बना दिया।अब सरकार का कर्तव्य है कि वह इसे वह सम्मान दे…।

यह रिपोर्ट सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि देश की जनभावना की प्रतिध्वनि है।जिस गीत ने आज़ादी की क्रांति में चिंगारी भरी, वह आज भी करोड़ों दिलों में आग भर सकता है।

अब गेंद सरकार के पाले में है—
क्या वह इस ऐतिहासिक अवसर पर इसे राष्ट्रगान जैसा सम्मान दिलाएगी? या यह मुद्दा अगले चुनावों में फिर सिर्फ एक वादा बनकर रह जाएगा?

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