बदायूँ। किशोर न्याय बोर्ड, बदायूँ ने समाज के सुधारात्मक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। बोर्ड ने एक नाबालिग आरोपी — जिसका नाम काल्पनिक रूप से “अजय” रखा गया है (वास्तविक नाम आदेशानुसार गोपनीय रखा गया है) — को जेल भेजने के बजाय एक माह तक गौशाला में सामुदायिक सेवा करने का निर्देश दिया है।
यह आदेश प्रधान मजिस्ट्रेट रोहिणी उपाध्याय, तथा सदस्य प्रमिला गुप्ता और अरविंद कुमार की संयुक्त पीठ ने पारित किया।
मामला क्या था
किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष थाना उझानी क्षेत्र का एक मामला विचाराधीन था, जिसमें 17 वर्ष 10 माह की आयु के नाबालिग “अजय” पर आरोप था कि उसने अपने साथियों के साथ एक नाबालिग लड़की से रास्ते में अशोभनीय हरकत की थी और विरोध करने पर पीड़िता के घर में घुसकर गाली-गलौज व धमकी दी थी। मामला धारा 452, 354, 323, 504, 506 भारतीय दंड संहिता एवं 7/8 पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किया गया था।
किशोर ने स्वीकार किया अपराध
मामले की सुनवाई के दौरान “अजय” ने अदालत में स्वेच्छा से अपना अपराध स्वीकार किया। उसने कहा कि वह बहुत गरीब परिवार से है, जानबूझकर गलती नहीं की, और अब अपने किए पर पछतावा है। उसने बोर्ड से दया की अपील की कि उसे सुधार का अवसर दिया जाए।
न्याय बोर्ड का मानवीय फैसला
प्रधान मजिस्ट्रेट रोहिणी उपाध्याय ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम का उद्देश्य दंड देना नहीं बल्कि किशोर को समाज की मुख्यधारा में लौटाना है। अपराध के समय आरोपी की मानसिक परिपक्वता पूरी तरह विकसित नहीं थी, इसलिए उसके सुधार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसी आधार पर न्याय बोर्ड ने “अजय” को दोषी पाते हुए यह आदेश दिया कि —
“विधि विवादित किशोर ‘अजय’ दिनांक 10 अक्टूबर 2025 से 10 नवम्बर 2025 तक (अवकाश छोड़कर) प्रतिदिन उझानी स्थित पंजीकृत गौशाला में सामुदायिक सेवा के रूप में कार्य करेगा।”
बोर्ड का निर्देश
न्याय बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया कि इस दोषसिद्धि से किशोर के भविष्य, शिक्षा या नौकरी पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। साथ ही थानाध्यक्ष को निर्देशित किया गया कि सेवा अवधि पूर्ण होने के बाद रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
यह भी कहा गया कि इस मामले से संबंधित किसी भी अभिलेख का किशोर के विरुद्ध भविष्य में दुरुपयोग किया जाना कानूनी अपराध माना जाएगा।
समाज के लिए संदेश
यह निर्णय यह दर्शाता है कि न्यायिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास की दिशा में सकारात्मक प्रयास करना है। बदायूँ किशोर न्याय बोर्ड का यह फैसला समाज में किशोर अपराधों से निपटने की संवेदनशील और मानवीय सोच का उदाहरण है।


























