आचमन संस्था के तत्वावधान में महिला रचनाकारों ने रखी भावनाओं की अभिव्यक्ति, डॉ. सोनरूपा विशाल रहीं मुख्य संयोजिका

बदायूं, साहित्यिक संस्था “आचमन” द्वारा “शब्दिता” श्रृंखला के अंतर्गत प्रोफेसर कॉलोनी स्थित एक साहित्यप्रेमी परिसर में महिलाओं की विशेष काव्य गोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस आयोजन में शहर की वरिष्ठ एवं नवोदित महिला साहित्यकारों ने अपने स्वरचित काव्य पाठ एवं प्रिय कवियों की रचनाओं से उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

गोष्ठी का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात कवयित्रियों की काव्यधारा बह चली, जिसमें जीवन, प्रकृति, सामाजिक व्यंग्य, प्रेम और परंपरा जैसे विविध भाव छाए रहे।

कविता में दिखी संवेदना और समकालीनता

ममता ठाकुर की रचना ने जहां मौसम की व्यथा और जल संकट की ओर संकेत किया, वहीं उन्होंने पढ़ा:
“बदरा तुम कब आओगे, बदरी भी नहीं छा रही।
झुलस गए वन, नदियां हैं सूख रहीं…”

डॉ. शुभ्रा माहेश्वरी ने आज के डिजिटल युग और सोशल मीडिया की स्थिति पर एक हास्य-व्यंग्य से भरपूर रचना सुनाई, जिसमें उन्होंने कहा:
“हम भी ऑनलाइन, तुम भी ऑनलाइन,
खिंच गई है शायद इसलिए ही लाइन।
माँ मुझे ऑनलाइन ही खाना खिला दो न,
रील्स में तो ठुमके लगाकर रिझाती हो…”

ममता नौगरिया ने “धूप और स्त्री” विषय को व्यंग्यात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत कर सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया।

डॉ. गायत्री प्रियदर्शिनी की प्रेम और सावन पर केंद्रित कविताएं सबके हृदय को छू गईं। उनकी पंक्तियां –
“सावन में तर-ब-तर,
मेरा शहर!
हम-तुम मिले,
मिलकर खिले,
लो… जल उठे दीये।”

डॉ. सरला चक्रवर्ती ने जीवन के विविध रंगों को गद्य पाठ के माध्यम से खूबसूरती से उकेरा।
डॉ. गार्गी बुलबुल की “बेटी और परिवार” पर केंद्रित रचना ने भावुक वातावरण उत्पन्न कर दिया।
शिक्षिका शारदा बावेजा ने राधा-कृष्ण के प्रेम से ओतप्रोत काव्यपाठ किया।

ग़ज़ल, भक्ति और विरासत के स्वर

डॉ. कमला माहेश्वरी की प्रस्तुत ग़ज़ल को खूब सराहना मिली।
डॉ. प्रतिभा मिश्रा ने मौसमानुकूल भक्ति गीत प्रस्तुत किया, जिसमें सावन और श्रीकृष्ण के अद्भुत चित्रण ने वातावरण को भक्ति रस से भर दिया।

गोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यसेवी श्रीमती उषाकिरण मिनोचा ने सभी रचनाकारों की प्रस्तुतियों पर सारगर्भित टिप्पणी करते हुए कहा कि – “यह मंच नारी संवेदना की गरिमा को मुखरता प्रदान करता है, जो साहित्य के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।”

परंपरा की स्मृति में गीत, संस्था की संस्थापक की प्रस्तुति

गोष्ठी की आयोजिका एवं आचमन संस्था की संस्थापक डॉ. सोनरूपा विशाल ने अपने बचपन की स्मृतियों और बुज़ुर्गों के आंगन की गूंज को एक गीत में पिरोते हुए सबकी आंखें नम कर दीं।

“दादी माँ का जाना अब तुलसी को भी खलता है।
साँझ हो गई चौरे पर जब दीप नहीं जलता है।”

उल्लेखनीय उपस्थिति और सफल संचालन

गोष्ठी में श्रीमती कुसुम रस्तोगी, श्रीमती मंजुल शंखधार, सुषमा भट्टाचार्य सहित संस्था के अनेक साहित्यप्रेमी सदस्य उपस्थित रहे।
गोष्ठी का कुशल संचालन स्वयं डॉ. सोनरूपा विशाल ने किया और अंत में सभी अतिथियों एवं कवयित्रियों का हृदय से आभार प्रकट किया।

“शब्दिता” की यह काव्य संध्या केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं थी, बल्कि नारी मन की भावनाओं, दृष्टिकोणों और अभिव्यक्ति को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का एक सशक्त मंच साबित हुई।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here