

बदायूं (समरेर ब्लॉक) उत्तर प्रदेश के बदायूं जनपद में एक घायल घोड़े की दर्दनाक चीखें उस व्यवस्था की पोल खोल रही हैं जो “जन सेवा” के नाम पर केवल कुर्सियाँ और जेबें गर्म कर रही है। ब्लेड वाले तारों से जख्मी हुआ यह घोड़ा घंटों सड़क किनारे तड़पता रहा, लेकिन कोई भी सरकारी अमला उसे बचाने नहीं पहुँचा। स्थानीय पशु प्रेमी विकेंद्र शर्मा ने जब यह दृश्य देखा तो उनका दिल दहल उठा।
उन्होंने फ़ौरन इस मामले की सूचना पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रख्यात पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी को दी। मेनका गांधी ने तत्परता दिखाते हुए जिलाधिकारी बदायूं से बात की और न सिर्फ घायल घोड़े को तत्काल रेस्क्यू करने, बल्कि ब्लेड वाले तारों को हटवाने के भी निर्देश दिए। लेकिन अफसोस, न आदेश की कद्र हुई, न घोड़े की जान की।
मंत्री के आदेश भी नहीं हिला सके सरकारी मशीनरी
एक ओर मेनका गांधी जैसे वरिष्ठ नेता और पशु अधिकारों की पैरोकार तुरंत सक्रिय हो जाती हैं, दूसरी ओर जिलाधिकारी स्तर के अधिकारी और स्थानीय प्रशासन के अन्य जिम्मेदार लोग आदेश मिलने के बावजूद चुप्पी साधे रहते हैं। सवाल उठता है – क्या अब पूर्व केंद्रीय मंत्री के हस्तक्षेप के बाद भी अगर कोई कार्यवाही नहीं होती, तो फिर किसकी सुनी जाएगी?
विकेंद्र शर्मा ने उठाया अकेले जिम्मा
जब प्रशासनिक अमला नाकाम रहा, तब विकेंद्र शर्मा खुद अपनी गाड़ी लेकर मौके पर पहुँचे, घायल घोड़े को रेस्क्यू किया और अपने शेल्टर तक लाकर उसकी चिकित्सा शुरू करवाई। यह सब बिना किसी सरकारी मदद या फंड के किया गया।
विकेंद्र शर्मा वर्षों से पशु-पक्षियों के लिए बिना किसी सरकारी सहायता फंड या वेतन के दिन-रात पशु पक्षियों की सेवा कर रहे हैं, लेकिन अफ़सोस – उनके जैसे कर्मठ पशु सेवकों को आज भी ना कोई सरकारी सहयोग मिलता है, ना ही सरकार से सराहना।चंद समाज सेवियों के कभी -कभी मिलने वाले सहयोग से यह सब करते चले आ रहे हैं।
सवाल यही है – आखिर जिम्मेदार कौन है?
क्या एक आम नागरिक की जिम्मेदारी है हर बार इन बेजुबानों को बचाना? पशुपालन विभाग, स्थानीय प्रशासन और पुलिस आखिर क्या कर रहे हैं? ब्लेड वाले तारों को हटाने का आदेश प्रदेश शासन से और स्थानीय जिला प्रशासन से पहले ही जारी हो चुका है, लेकिन यह आदेश केवल फाइलों में धूल खा रहा है, ज़मीनी स्तर पर अमल मे होता तो रोज़ पशुओं की यह हालत नहीं होती।
इस घटना ने न सिर्फ प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखा दिया कि अगर आज कोई इन बेजुबानों के लिए खड़ा है, तो वह सिर्फ और सिर्फ आम जनता के बीच से निकलने वाले पशु प्रेमी हैं – जैसे कि विकेंद्र शर्मा।
ईश्वर देख रहा है…
जब अधिकारी अपने दायित्वों से मुँह मोड़ लें, मंत्री की बात को भी अनसुना कर दिया जाए, और एक जीव की पीड़ा को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए – तब प्रकृति और ईश्वर दोनों मौन नहीं रहते। इस घोर लापरवाही के लिए ज़िम्मेदार चाहे खेत मालिक हो या शासन-प्रशासन – लोगों के दिल से उनके लिए अब सिर्फ बद्दुआ ही निकल रही है।


























