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राष्ट्रीय पक्षी के साथ हो रहा अत्याचार, मोर पंखों का खुलेआम व्यापार, प्रशासन की अनदेखी पर सवाल

बाजार में मोर पंख से बने आइटम की भरमार, कानून बेअसर

साभार : विकेंद्र शर्मा (पशु प्रेमी) के सहयोग से तैयार की गई रिपोर्ट

बाजारों में आजकल मोर पंखों से बने आइटम की भरमार है। जहां एक तरफ मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया है, वहीं दूसरी तरफ मोर पंखों की बिक्री पर प्रशासन की कोई नजर नहीं है। ऐसा लगता है जैसे वन्य जीव संरक्षण अधिनियम का पालन करने के बजाय उसे नजरअंदाज किया जा रहा है।

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनदेखी

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत किसी भी वन्य जीव को मारना, पालना, उनसे खेल दिखाना या उनसे बनी वस्तुओं की बिक्री करना गैरकानूनी है। इस अधिनियम की धारा 51 के तहत, अगर कोई व्यक्ति इस कानून का उल्लंघन करता है, तो उसे कम से कम 3 साल से लेकर 7 साल तक की सजा हो सकती है। साथ ही, धारा 51 के तहत 25,000 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

मोर के पंखों का व्यापार: धारा 39 और धारा 49 की अनदेखी

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 39 के अनुसार, कोई भी वन्य जीव, उसका हिस्सा या उससे बनी कोई भी वस्तु सरकार की संपत्ति मानी जाती है। इसका मतलब यह है कि मोर पंख जैसे उत्पादों का व्यापार गैरकानूनी है। इसके अलावा, धारा 49 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी वन्य जीव या उसके हिस्से का व्यापार, आयात-निर्यात, खरीद-बिक्री करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इसके बावजूद मोर पंखों का धड़ल्ले से व्यापार हो रहा है, जो कानून का खुला उल्लंघन है।

प्रशासन और वन विभाग पर सवाल

यह चिंता का विषय है कि वन विभाग और प्रशासन दोनों ही इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। मोर पंखों के व्यापार पर रोक लगाने के लिए प्रशासन को सख्त कदम उठाने की जरूरत है। अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो वन्य जीव संरक्षण अधिनियम केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा।

राष्ट्रीय पक्षी मोर के संरक्षण के लिए आवश्यक है कि मोर पंखों की बिक्री पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाई जाए और कानून का सख्ती से पालन किया जाए। प्रशासन और वन विभाग को अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

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