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डॉक्टर उर्मिलेश जी की जीवन यात्रा, उनकी पुण्यतिथि 16 मई पर स्वदेश केसरी का विशेषांक !

बदायूँ। राष्ट्रकवि डॉक्टर उर्मिलेश जी की पुण्यतिथि कल 16 मई को है, इस अवसर पर स्वदेश केसरी न्यूज़ ने उनसे जुड़ी कुछ जानकारी, उनके व्यक्तित्व को अपने इस छोटे से लेख के माध्यम से आप सभी तक पहुंचाने का प्रयास किया है।उनके व्यक्तित्व के हिसाब से तो यह सूर्य को दीपक दिखाने जैसा ही प्रयास है जिसे कुछ कॉलम में नहीं लिखा जा सकता है । डॉक्टर उर्मिलेश शांति और क्रांति के कवि थे। उनकी रचनाओं में देशभक्ति की भावना इस कदर भरी हुई थी,जब वह उन रचनाओं को पढ़ते थे उस समय उनको सुनने वाले श्रोताओं के रोंगटे खड़े हो जाते थे, ऐसी ही एक रचना “चाहें जिंदा रहें चाहें मर जाये हम गायेंगे गायेंगे हम वन्देमातरम” राष्ट्रीय पर्वों पर आजभी इसको बजाया व गाया जाता है जिसे सुनकर लोगों के रोम रोम में देश प्रेम का जोश भर जाता है। उनकी रचना पढ़ने की उनकी शैली समुद्र की लहरों की तरह थी जो इतने विशाल सागर पर विभिन्न रूपों से उस पर राज करती दिखाई देती है जब समुद्र की लहर शांत गति से बहती है तो लोगों को शान्ति व सकून का ऐहसास देती है ठीक इसी स्वभाव से जब डॉ उर्मिलेश प्रेम की रचना पढ़ते थे तब लोगों के दिलों में प्रेम से भरी उमंग को पैदा कर देती थे ,वहीँ देश प्रेम की रचना को सुनकर लोगों के तन मन मे ऐसा जोश भर देते थे , जैसे समुद्र में ज्वार भाटा आ गई हो।वह हिन्दी साहित्य के दैदीप्तमान नक्षत्र डॉ. उर्मिलेश हिन्दी गीत, नवगीत और ग़ज़ल के बेताज बादशाह डॉ. उर्मिलेश बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे एक सफल अध्येता, कुशल समीक्षक, यशस्वी मंच-संचालक तथा जन-जन के हृदय पर आधिपत्य स्थापित करने वाले युवा हृदय-सम्राट थे।

हिन्दी-जगत् में वे अल्प अवधि में ही लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गये-इसका कारण उनका चुम्बकीय व्यक्तित्व, हृदयावर्जक भावाभिव्यंजना तथा दर्शकों की हृत्तन्त्री को झंकृत कर देने वाला सुमधुर काव्य-पाठ।
डॉ. उर्मिलेश का जन्म 6 जुलाई, 1951 ई. को उनकी ननिहाल इस्लामनगर (बदायूँ) में हुआ। पिताश्री स्व० भूपराम शर्मा ‘भूप’ ग्राम भतरी गोवर्धनपुर में यशस्वी जनकवि के रूप में विख्यात थे। डॉ. उर्मिलेश ने. मै. शिव नारायण दास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बदायूँ में हिन्दी विभाग के रीडर/अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। डॉ. उर्मिलेश की साहित्य-साधना बहुमुखी थी, उन्होंने अल्प अवधि में अनेक हीरक हिन्दी जगत् को प्रदान किये, जिनकी आभा आज भी विद्यमान है। ‘साहित्य और समालोचना के सरल आयाम’, ‘नया सप्तक: व्याख्या और विवेचन के नए आयाम’ तथा ‘गीति सप्तकः पहचान और परख’ उनके प्रमुख समीक्षात्मक ग्रन्थ है।

डॉ. उर्मिलेश द्वारा रचित काव्य ग्रन्थों की सूची बहुत लंबी है जिसमें प्रमुख – ‘‘सोत नदी बहती है’’, ‘‘धुआँ चीरते हुए’’ (ग़ज़ल संग्रह), ‘‘डॉ. उर्मिलेश की ग़ज़लें’’, ‘‘घर बुनते अक्षर’’ (मुक्तक संग्रह), ‘‘चिरजीव हैं हम’’ (गीत संग्रह), ‘‘गंधो की जागीर’’ (दोहा संग्रह), ‘‘वरदानों की पाण्डुलिपि’’ (दोहा संग्रह), ‘‘बाढ़ में डूबी नदी’’ (गीत संग्रह), ‘‘फैसला वो भी ग़लत था’’ (ग़ज़ल संग्रह), ‘‘धूप निकलेगी’’ (ग़ज़ल संग्रह), ‘‘जागरण की देहरी पर’’ (गीत संग्रह), ‘‘बिम्ब कुछ उभरते हैं’’ (गीत संग्रह) तथा ‘‘आईने आह भरते हैं’’ (ग़ज़ल संग्रह)। विनय कैसेट्स, नीमच (म. प्र.) ने ‘‘डॉ. उर्मिलेश कैसेट्स’’ तथा डॉ. विष्णु सक्सेना ने ‘‘डॉ. उर्मिलेश के गीत’’ कैसेट की भावभीनी गीतांजलि प्रस्तुत की है।


डॉ० उर्मिलेश की काव्य-साधना विराट थी, उनका चिन्तन राष्ट्रव्यापी था, वे रस-सिद्ध कवि और नये तेवर के यशस्वी ग़ज़लकार रहें। बदायूं क्लब के सचिव के रुप में उन्होंने जिले में सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों को एक नया आयाम दिया। उन्होंने अपने सम्बन्धों के बल पर ही बदायूँ महोत्सव में देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक या फिर प्रदेश के उच्च पदों पर आसीन प्रशासनिक अधिकारी भी उनके प्रशंसको में थे,इसी कारण सभी ने महोत्सव में आकर महोत्सव की शोभा बढ़ाई।उनकी अपनी एक चमक थी एक धमक थी, अच्छे कपड़ों व खुशबूदार इत्र के बड़े शौकीन थे,बड़े बड़े कवि उनके इस शौक की चर्चा आज भी करते मिल जाएंगे, उनकी इस साहित्यिक यात्रा का झंडा अब उनकी पुत्री डॉ सोनरूपा विशाल, व उनके पुत्र डॉक्टर अक्षत अशेष ने उठा रखा है, जो देश दुनिया मे उनके यश की पताका को लहरा रहे हैं।

उनके द्वारा स्थापित जिले का प्रमुख सांस्कृतिक उत्सव ‘बदायूँ महोत्सव’ आज प्रदेश एवं देश के प्रमुख आयोजनों में से एक है। ‘गीत गन्धर्व’, ‘भारतश्री’, ‘साहित्य सारस्वत’, ‘युग चारण’, ‘कवि भूषण’ तथा ‘राष्ट्रकवि’, ‘यशभारती’ अलंकरण आज भी उस ‘प्रिन्स’ की प्रतीक्षा कर रहे हैं। चेहरे पर वही मधुर मुस्कान…………….व्योम में झूलते दोनों हाथ……..होठों पर अमृत स्यन्दिनी कविता का हास…………वाणी में गूँजती राष्ट्र-लहरी………उर्मिलेश गा रहे हैं-
‘उलझनों के दौर आखिर कब नहीं होंगे
याद तो होगी हमारी हम नहीं होंगे’’

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