बदायूँ। उझानी के हास्य कवि टिल्लन वर्मा ने कल जनसंख्या दिवस पर अपनी फेशबुक आईडी (शोशल मीडिया)पर अपनी एक रचना शेयर करते हुए नई पीढ़ी को दिल को छूने वाला सन्देश दिया है,शोशल मीडिया पर इस रचना को खूब सराहा जा रहा है,

स्वदेश केसरी ने टिल्लन वर्माजी फेसबुक की वॉल से कॉपी कर अपने पाठकों तक पहुंचा रहे हैं,आप सब भी एक कवि के सुंदर शब्दों में समाज को आगाह करती इस कविता का आनंद लीजिए।साभार टिल्लन वर्माजी
जब मैं जन्मा था तब मेरा भी था घर लम्बा – चौड़ा
हुआ विभाजन तब हिस्से में आया घर थोड़ा – थोड़ा
तब आँगन में फुलवारी थी, खुश्बू थी, हरियाली थी
साफ़ – सफ़ाई इतनी रहती, हर दिन ही दीवाली थी
गिल्ली – डन्डा और कबड्डी खेले थे जिस आँगन में
जीवन के उपलब्ध सभी सुख पहले थे जिस आँगन में
अब अनेक बच्चे हैं उसमें, चैन नहीं है दो पल का
आँगन बंटा कई कमरों में साम्राज्य कोलाहल का
धुँआँ,गन्दगी,मख्खी-मच्छर हुआ प्रदूषित सारा घर
और परस्पर तू- तू , मैं – मैं भी हो जाती है अक्सर
बच्चो ! जो ग़लती हमने की यदि तुम भी दोहराओगे
अपने अनुभव से कहते हैँ, जीवन भर पछताओगे


























