- सुबह लगभग आठ बजकर दस मिनट से पुण्य काल प्रारंभ-
- मकर संक्रांति दोपहर 2 बजकर 27 मिनट पर रोहणी नक्षत्र, ब्रह्म योग और आनंदादि योग का निर्माण,काफी शुभ समय।
- इस दिन किए जाने वाले दान को महादान की श्रेणी में रखा गया है।
- इस पर्व को तीर्थों और देवताओं का महाकुंभ पर्व कहा जाता है
इस दिन सभी देवता भगवान श्री विष्णु और मां श्रीमहालक्ष्मी का पूजन-अर्चन करके अपने दिन की शुरुआत करते हैं अतः श्रीविष्णु के शरीर से उत्पन्न तिल के द्वारा बनी वस्तुएं और श्रीलक्ष्मी के द्वारा उत्पन्न इक्षुरस अर्थात गन्ने के रस से बनी वस्तुएं जिनमें गुड़-तिल का मिश्रण हो उसे दान किया जाता है
14 जनवरी को ही सुबह लगभग आठ बजकर दस मिनट से पुण्य काल प्रारंभ हो जाएगा। मकर संक्रांति दोपहर 2 बजकर 27 मिनट (14:27)पर रोहणी नक्षत्र, ब्रह्म योग और आनंदादि योग का निर्माण हो रहा है, जो कि काफी शुभ है। माना जाता है कि रोहणी नक्षत्र में दान-पुण्य करने से यश की प्राप्ति होती है और कष्टों का अंत होता है।
आचार्य अतुल कृष्ण जी के मुताबिक मकर राशि में सूर्य के प्रवेश के दौरान सूर्यदेव की पूजा फलदायी होती है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं इसलिए इसे मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। यह दिन बड़ा पावन माना जाता है क्योंकि इस दिन से खरमास(पौष) का अंत होता है, जिससे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।
मकर संक्रांति पर स्नान-दान-
इस पर्व पर समुद्र में स्नान के साथ-साथ गंगा, यमुना, सरस्वती, नमर्दा, कृष्णा, कावेरी आदि सभी पवित्र नदियों में स्नान करके सूर्य को अर्घ्य देने से पापों का नाश तो होता ही है पितृ भी तृप्त होकर अपने परिवार को आशीर्वाद देते हैं यहां तक कि इस दिन किए जाने वाले दान को महादान की श्रेणी में रखा गया है। वैसे तो सभी संक्रांतियों के समय जप-तप तथा दान-पुण्य का विशेष महत्व है किन्तु मेष और मकर संक्रांति के समय इसका फल सर्वाधिक प्रभावशाली कहा गया है उसका कारण यह है कि मेष संक्रांति देवताओं का अभिजित मुहूर्त होता है और मकर संक्रांति देवताओं के दिन का शुभारंभ होता है। इस दिन सभी देवता भगवान श्री विष्णु और मां श्रीमहालक्ष्मी का पूजन-अर्चन करके अपने दिन की शुरुआत करते हैं अतः श्रीविष्णु के शरीर से उत्पन्न तिल के द्वारा बनी वस्तुएं और श्रीलक्ष्मी के द्वारा उत्पन्न इक्षुरस अर्थात गन्ने के रस से बनी वस्तुएं जिनमें गुड़-तिल का मिश्रण हो उसे दान किया जाता है।
ऊनी कंबल, जरूरतमंदों को वस्त्र विद्यार्थियों को पुस्तकें पंडितों को पंचांग आदि का दान भी किया जाता है। अन्य खाद्य पदार्थ जैसे फल, सब्जी, चावल, दाल, आटा, नमक आदि जो भी यथा शक्ति संभव हो उसे दान करके संक्राति का पूर्ण फल प्राप्त किया जा सकता है पुराणों के अनुसार जो प्राणी ऐसा करता है उसे विष्णु और श्रीलक्ष्मी दोनों की कृपा प्राप्त होती है।
मकर संक्रांति पर तीर्थपतियों का प्रयाग आगमन-
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।।
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और माघमाह के संयोग से बनने वाला यह पर्व सभी देवों के दिन का शुभारंभ होता है। इसी दिन से तीनों लोकों में प्रतिष्ठित तीर्थराज प्रयाग और गंगा, यमुना और सरस्वती के पावन संगमतट पर साठ हजार तीर्थ, नदियां, सभी देवी-देवता, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर आदि एकत्रित होकर स्नान, जप-तप, और दान-पुण्य करके अपना जीवन धन्य करते हैं। तभी इस पर्व को तीर्थों और देवताओं का महाकुंभ पर्व कहा जाता है।
मकर संक्रान्ति पर्व धर्म व विज्ञान का अदभुत जीवन्त दृश्य
नक्षत्र विज्ञान के अनुसार इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की और प्रवेश करता है। भारत वर्ष में लगभग समस्त पर्व चंद्रकलाओं के आधार पर मनाए जाते हैं, वहीं मकर संक्रांति का पर्व पृथ्वी की गति को आधार बना कर मनाया जाता है। यही कारण है कि इसी निश्चित तिथि को यह पर्व आता है। शेष समस्त पर्वो की तिथियों में तो अंतर आता है लेकिन यह पर्व स्थिर है,14 जनवरी को ही आता है। जिस दिन भगवान सूर्य नारायण उत्तर दिशा की और प्रयाण करते हैं उस दिन उत्तरायण पर्व (मकर संक्रान्ति) मनाया जाता है। इस दिन से अंधकारमयी रात्रि कम होती जाती है और प्रकाश मय दिवस बढ़ता जाता है। प्रकृति का यह नियम हमें प्रेरणा देता है कि हम भी अपना जीवन उन्नति की और अग्रसर करें। अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर आत्म ज्ञान रूपी प्रकाश प्राप्त करने का यत्न करें।
तैतरीयोपनिषद में आता है –
उदिते हि सूर्य मृतप्रायम जगत्पुनश्चेतनायुक्तम।यौऽसौ तपन्नुदेति से सर्वेषां भूतानां प्राणानादेयेदेति।।
जैसे सूर्य उदित होकर अपनी उज्ज्वल रश्मियों से तेजपूर्ण आभा से संपूर्ण भूमंडल को प्रकाशित कर देते हैं, उसी प्रकार है मानव ! तू स्वयं ऊंचा उठ। उन्नत हो और सूर्य की भांति अपना आत्मतेज विकसित कर। फिर बिना किसी भेदभाव के संपूर्ण जन मानस के हताश-निराश हृदयों को आशा, उत्साह व आनन्द के आलोक से सरोबार कर दें। ऋषि कहते हैं-हे मानव । तू सूर्य की भांति बन ।
सूर्य नारायण समुद्र, नदियों, नालों, कीचड़, आदि विभिन्न स्थानों से तो जल उठा लेते हैं लेकिन समुद्र के खारेपन व नालों के गंदेपन से स्वयं प्रभावित नहीं होते। साथ ही वे बादलों की उत्पत्ति मैं एक जीव जगत को स्फूर्ति ताजगी प्रदान करने के कारण स्वरूप होकर परोपकार के कार्यों में संलग्न रहते हैं। उनकी भांति आप भी सद्गुणों को कहीं से भी उठा ले और परोपकार में संलग्न रहे लेकिन स्वयं किसी के दुर्गुणों से प्रभावित न हो। इस प्रकार आप अपना लक्ष्य ऊंचा बना लीजिए । और उसे रोज दोहराएं । फिर तो प्रकृति और परमात्मा आप को कदम कदम पर सहयोग और सत्प्रेरणा देंगे। आप अपने लक्ष्य पर अडिग रहने की प्रतिज्ञा कीजिए और एकांत में उसे दोहराइए। जैसे मेरी इस प्रतिज्ञा को यक्ष गंधर्व किन्नर आदि सब सुने। आज से में गुरुदेव के भगवान के ह्रदय को ठेस पहुंचे। ऐसा कोई काम नही करूंगा। ऐसा कहने से आपक मनोबल बड़ेगा। शेष भगवद कृपा आप को संभाल लेगी। महाभारत के भीष्म पर्व मे आता है जिसने सदगुरु को रिझा लिया तो समझो उसने ब्रह्मलोक पर्यन्त के समस्त ऋषियों व देवताओं को प्रसन्न कर लिया। ऐसा करने से वह स्वयं भी प्रसन्न रहता है।
आज के पावन दिन सभी यह प्रण करें कि हमारा शरीर स्वस्थ रहे। मन प्रसन्न रहे। और आपकी बुद्धि में बुद्धिदाता की ज्योति जग जाएं।
हमारे तीनों शरीरों, पांच कोषों, व सातों केंद्रों पर ग्रहों नक्षत्रों और तिथियों का प्रभाव पड़ता है। और उन्हीं के प्रभाव से हमारा मन भी प्रभावित होता है। लेकिन आत्मज्योति(ज्ञान) इन सारे प्रभावों, आपदाओं, दुखों व क्लेशों से दूर है। इसी ज्योति का प्रसाद पाने के लिए आज के दिन की प्रतीक्षा की थी। आठ वासुओं में एक भीष्म पितामह ने, शारीरिक कष्ट स्वीकार किए। लेकिन इस ज्योति का प्रसाद पा कर ही रहे। भीष्म पितामह ने आज ही के दिन अपनी देह को पंचमहाभूतों में विलीन करने का संकल्प किया था। इसलिये इसको भीष्म पर्व भी कहते हैं। जो निःसंतान दंपति आज के दिन भीष्म पितामह के लिए तर्पण करते हैं उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।
आज के दिन किए गए सत्कर्म विशेष फलदाई होते हैं। आज के दिन भगवान शिव को तिल चावल अर्पण करने का भी विधान है। आज के पर्व मे तिल का विशेष महत्व है।
तिल का उबटन लगाना, तिल मिश्रित जल को पीना व स्नान करना, तिल का सेवन, हवन सभी पापनाशक व पुण्यदायी प्रवृत्तियां है।
आज के पावन दिवस पर साधक यह प्रण करें कि ‘मैं अपने जीवन में क्रांति लाकर रहूंगा। अपनी तुच्छ आदतों को कुचल डालूंगा। प्रतिदिन जप तप, ध्यान एवं प्रार्थना करूंगा,स्वाध्याय करूंगा, और जीवन को अपने अहम के बल से नहीं, अपितु भगवद कृपा से महान बना कर रहूंगा।’


























