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‘वाह रे रेलवे का विकास!’ : अंडरपास है या मौत का कुआँ? सरकार के ‘हवा-हवाई वादे और ज़मीनी हक़ीक़त’ देश मे बन रहा विकास’ या ‘विनाश का मॉडल’?: देश के इंफ्रास्ट्रक्चर की उधड़ रही बखिया! स्वदेश केसरी की विशेष रिपोर्ट

साभार:झारखण्ड रितेश कुमार रिपोर्टर

गोड्डा/झारखंड। एक तरफ टीवी विज्ञापनों में देश को ‘विश्वगुरु’ बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, चाँद-मंगल पर पानी खोजने की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ धरातल पर करोड़ों-अरबों रुपये की लागत से बना इंफ्रास्ट्रक्चर पहली बारिश में ही ताश के पत्तों की तरह ढह रहा है। ऐसा ही ताज़ा मामला झारखंड के ‘गोड्डा जिले स्थित पैरडीह (पैरडी) रेलवे अंडरपास की खौफनाक वीडियो ने एक बार फिर भारतीय रेलवे, रेल मंत्रालय और पूरे सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

1. गोड्डा का ‘मौत का कुआँ’: 8 फीट पानी में डूब गया ट्रैक्टर

गोड्डा के पैरडीह में रेलवे द्वारा बनाया गया अंडरपास मामूली बारिश में ही 7 से 8 फीट गहरे ‘महासागर’ में तब्दील हो गया।जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग: स्थानीय पत्रकार रितेश और ग्रामीणों ने जब इस ‘इंजीनियरिंग करिश्मे’ की पोल खोलने के लिए पानी में ट्रैक्टर उतारा, तो देखते ही देखते पूरा ट्रैक्टर पानी में समा गया और उसकी स्टीयरिंग तक डूब गई। पत्रकार की यह कबरेज यमराज को आमंत्रण जैसी थी किसी तरह अपनी जान बचाकर बाहर निकले लोगों के चेहरों पर खौफ यह साफ बयां कर रहा था कि अगर यहाँ कोई स्कूली बच्चा या बाइक सवार होता, तो बड़ा हादसा तय था।

इंजीनियरिंग की नाकामी या भ्रष्टाचार का गड्ढा?
करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाले रेलवे अंडरपास में वाटर ड्रेनेज (जल निकासी) का कोई पुख्ता इंतज़ाम नहीं किया गया है। महज़ दो-तीन घंटे की बारिश में ही अंडरपास तालाब में तब्दील हो जाता है। सवाल उठता है कि जब इस अंडरपास का नक्शा पास किया जा रहा था, तब रेलवे के आला इंजीनियरों और अफसरों की नज़र जल निकासी पर क्यों नहीं पड़ी? क्या यह सीधे-सीधे घटिया निर्माण और प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा नहीं है?

जनता का आक्रोश: ड्रेनेज सिस्टम न होने के कारण पैरडीह, तेतरिया और बरन समेत आधा दर्जन गाँवों का शहर से संपर्क कट गया है।पानी भरने के बाद न तो स्कूली बच्चे स्कूल जा पा रहे हैं और न ही किसी आपात स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाया जा सकता है। ग्रामीणों को कई किलोमीटर लंबा चक्कर लगाकर अपने गंतव्य तक जाना पड़ रहा है।

‘विश्वगुरु’ बनने चले थे, अंडरपास में डुबो दी जनता!

रेल मंत्रालय आए दिन आधुनिक स्टेशनों और नई ट्रेनों के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन ज़मीनी हक़ीकत यह है कि आम जनता और किसानों के दैनिक रास्तों को बदहाल छोड़ दिया गया है। ग्रामीण लंबे समय से यहाँ रेलवे ओवरब्रिज (ROB) निर्माण की माँग कर रहे हैं, लेकिन जनसुविधा के नाम पर रेलवे ने एक ऐसा अंडरपास थमा दिया जो बारिश आते ही जलसमाधि ले लेता है। ग्रामीणों और यूथ कांग्रेस ने रेलवे प्रशासन व स्थानीय नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए गोड्डा-हंसडीहा रेल खंड जाम करने की चेतावनी दी है।

2. उद्घाटन से पहले धंस रहे एक्सप्रेस-वे और दरकती सड़कें

गोड्डा का अंडरपास तो सिर्फ एक बानगी है। पूरे देश में स्पीड से विकास’ के नाम पर बनाए जा रहे एक्सप्रेस-वे और नेशनल हाईवे निर्माण की गुणवत्ता और नीयत दोनों पर सवाल खड़े कर रहे हैं: बहुत से उद्घाटन के पहले और कुछ उद्घाटन के तुरंत बाद धंस रहे हैं, करोड़ों-अरबों की लागत से बने नए एक्सप्रेस-वे और हाईवे (जैसे बुंदेलखंड और पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, दिल्ली देहरादून हाइवे, मेरठ से प्रयागराज एक्सप्रेस वे, लखनऊ कानपुर हाइवे जैसे अनगिनत हर राज्य मे ) उद्घाटन के पूर्व अथवा बाद के कुछ ही हफ्तों या पहली बारिश में ही धंसते नजर आए।

तालाब बनती सड़कें: स्मार्ट सिटी और फोर-लेन प्रोजेक्ट्स के दावे के बीच देश के छोटे-बड़े शहरों की सड़कें पहली ही बारिश में नदियों और तालाबों में बदल जाती हैं।

कार्रवाई के नाम पर लीपापोती:

हाल ही में राजमार्ग मंत्रालय को राष्ट्रीय राजमार्गों पर धंसने, गड्ढे होने और घटिया निर्माण के चलते दर्जनों अधिकारियों को सस्पेंड/बर्खास्त करना पड़ा। सवाल यह है कि ऐसे कांट्रैक्टर्स और अफसरों पर सिर्फ विभागीय कार्रवाई ही क्यों, आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं?

3. ‘ताश के पत्तों’ की तरह गिरते पुल और ढहती पानी की टंकियाँ: पुलों का जलसमाधि रिकॉर्ड: बिहार से लेकर गुजरात तक, पिछले कुछ वर्षों में दर्जनों निर्माणाधीन और नए बने पुल देखते ही देखते नदियों में समा गए। करोड़ों रुपये का पब्लिक टैक्स पानी में बह गया, लेकिन ठेकेदारों पर कोई सख्त सबक देने वाली कार्रवाई नहीं हुई। जल जीवन मिशन में ‘पानी’ हुआ पैसा: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ के तहत ग्रामीण इलाकों में बनी पानी की विशाल टंकियाँ (जैसे उत्तर प्रदेश के कई जिलों में) कमीशनिंग के कुछ ही हफ्तों में धराशायी हो गईं। जो टंकियाँ ग्रामीणों को पानी देने के लिए बनी थीं, वे अब हादसों का कारण बन रही हैं।

4. एयरपोर्ट्स का घटिया निर्माण: ‘आधुनिकता’ के नाम पर जानलेवा लापरवाही हवाई यात्रा को सुलभ बनाने के दावों के बीच देश के प्रमुख हवाई अड्डों के निर्माण स्तर पर भी भारी सवाल उठे हैं: छतें और कैनोपी ढहना: दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल-1 से लेकर राजकोट और जबलपुर हवाई अड्डों के नए स्ट्रक्चर और कैनोपी बारिश के दौरान ढह गए, जिसमें मासूम लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी।

विश्वस्तरीय दावों की हकीकत: क्या भारी-भरकम बजट और ‘विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर’ के विज्ञापनों का सच यही है कि थोड़ी सी बारिश भी इन आधुनिक इमारतों की पोल खोल देती है?

तीखे सवाल: जनता टैक्स भरे और बदले में ‘मौत’ उपहार में मिले? 1. कहाँ जा रहा है जनता का गाढ़ी कमाई का टैक्स? टोल टैक्स, इनकम टैक्स और रोड टैक्स चुकाने के बाद भी अगर जनता को डूबती सड़कें और धंसते अंडरपास मिलें, तो इस सिस्टम को क्या कहा जाए? 2. ठेकेदार-अधिकारी-नेता गठजोड़: क्या इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स सिर्फ कमीशनखोरी और कागजी तरक्की दिखाने का जरिया बन चुके हैं? 3. जवाबदेही किसकी? गोड्डा के पैरडीह में ड्रेनेज न बनाने वाले रेलवे इंजीनियरों से लेकर, देश भर में गिरते पुलों और ढहती टंकियों के जिम्मेदार ठेकेदारों को जेल की सलाखों के पीछे कब भेजा जाएगा?

निष्कर्ष
पैरडीह के खौफनाक वीडियो और देश भर में लगातार सामने आ रही इंफ्रास्ट्रक्चर की तबाही ने सिस्टम की चूलें हिलाकर रख दी हैं। कागजी दावों और धरातल की हकीकत के बीच का यह गड्ढा अब आम जनता की जान ले रहा है। वक्त आ गया है कि ‘विश्वगुरु’ के नारों से इतर ज़मीनी काम की गुणवत्ता और कठोर जवाबदेही तय की जाए!
गोड्डा पैरडीह अंडरपास में जलजमाव और ग्रामीणों के आक्रोश का वीडियो
यह वीडियो गोड्डा के पैरडीह रेलवे अंडरपास में बारिश के बाद बने जलजमाव की जमीनी हकीकत और प्रभावित ग्रामीणों के विरोध को स्पष्ट रूप से दिखाता है।

अब देखना यह होगा कि इस वीडियो के वायरल होने के बाद कुंभकर्णी नींद सो रहा रेल मंत्रालय और रेलवे प्रशासन चेतता है या फिर किसी बड़े हादसे का इंतज़ार करता है!

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