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‘बहुत हुई महंगाई की मार’ का नारा फिर चर्चा में! ₹45 की चीनी ₹65 किलो हुई, सात दिन में ₹20 किलो की बढ़ोतरी , क्या इसे ही कहते हैं ‘अच्छे दिन’ पर जनता कर रही सवाल! 2027 में जनता देगी सरकार को इसका जवाब?

त्योहारों से पहले सरकार ने बिगाड़ा रसोई का बजट..

बदायूं। कभी चुनावी राजनीति में महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा हुआ करती थी और आज वही महंगाई एक बार फिर आम आदमी की रसोई तक पहुंचती दिखाई दे रही है। पेट्रोल-डीजल से लेकर खाद्य पदार्थों तक बढ़ती कीमतों के बीच अब चीनी के दामों में तेज उछाल ने गृहणियों, व्यापारियों और मिठाई कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है। बाजार में चीनी के भाव तेजी से बढ़ने के दावों के बीच सवाल उठ रहा है कि आखिर महंगाई का यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा?

बाजार से जुड़े आंकड़ों और कारोबारियों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक महज कुछ सप्ताह में थोक बाजार में चीनी का भाव करीब 47 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 60 रुपये किलो तक पहुंच गया है, जबकि खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को यही चीनी करीब 65 रुपये किलो तक खरीदनी पड़ रही है। यानी कुछ ही समय में कीमतों में करीब 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक का अंतर देखने को मिल रहा है।

‘पहले बहुत हुई महंगाई की मार’… अब जनता पूछ रही सवाल

महंगाई को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर रहा है। वर्ष 2014 से पहले भाजपा की ओर से महंगाई को लेकर तत्कालीन सरकार पर निशाना साधते हुए ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार…’ जैसे नारे लगाए जाते थे। आज विपक्ष और आम उपभोक्ता उसी पुराने राजनीतिक सवाल को मौजूदा सरकार के सामने रख रहे हैं कि आखिर महंगाई पर नियंत्रण कब होगा?

बदायूं के बाजारों में भी चीनी के बढ़ते दाम को लेकर उपभोक्ताओं में चर्चा है। लोगों का कहना है कि रसोई में इस्तेमाल होने वाली चीनी जैसी रोजमर्रा की वस्तु यदि इतनी तेजी से महंगी होती है तो इसका सीधा असर आम परिवार के मासिक बजट पर पड़ता है।

एथेनॉल नीति को बताया जा रहा चीनी की कीमत बढ़ने की एक वजह

बाजार विशेषज्ञों और कारोबारियों के अनुसार चीनी के दाम बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें गन्ने के इस्तेमाल, चीनी उत्पादन, आपूर्ति और एथेनॉल उत्पादन की नीति को भी प्रमुख कारकों में गिना जा रहा है। पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के तहत गन्ने के रस और शीरे का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में किया जाता है।

व्यापारियों का तर्क है कि यदि गन्ने की उपलब्धता का बड़ा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर जाता है और चीनी उत्पादन के लिए उपलब्धता प्रभावित होती है, तो बाजार में आपूर्ति कम होने पर कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, चीनी की कीमतों में मौजूदा वृद्धि को केवल एथेनॉल नीति का परिणाम मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि उत्पादन, मौसम, गन्ने की कीमत, स्टॉक और बाजार की मांग समेत कई कारक कीमतों को प्रभावित करते हैं।

त्योहारों से पहले बढ़ी चिंता, मिठाइयों पर भी पड़ेगा असर

आने वाले दिनों में रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी और दीपावली जैसे प्रमुख त्योहार हैं। ऐसे में चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का असर मिठाई और बेकरी कारोबार पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। मिठाई कारोबारियों का कहना है कि चीनी महंगी होने से उत्पादन लागत बढ़ेगी और इसका असर अंततः मिठाइयों की कीमतों पर पड़ सकता है।

अगर चीनी के दाम इसी रफ्तार से बढ़ते रहे तो आने वाले समय में खुदरा कीमतों के और ऊपर जाने की आशंका जताई जा रही है। इससे पहले से महंगाई की मार झेल रहे मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों का घरेलू बजट और बिगड़ सकता है।

‘तेल से थाली तक’ पहुंची महंगाई, 2027 में क्या होगा राजनीतिक असर?

महंगाई को लेकर सबसे बड़ा सवाल अब राजनीतिक भी बनता जा रहा है। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और खाद्य वस्तुओं की कीमतों को लेकर विपक्ष समय-समय पर सरकार को घेरता रहा है। आम लोगों का सवाल है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिस्थितियां बदलने या कीमतें नीचे आने के बावजूद घरेलू बाजार में उपभोक्ताओं को तत्काल राहत नहीं मिलती, तो सरकार की मूल्य निर्धारण नीतियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

बदायूं में लोगों के बीच अब चर्चा यह भी है कि 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान महंगाई कितना बड़ा मुद्दा बनेगी। क्या जनता बढ़ती कीमतों का हिसाब वोट के जरिए करेगी? या चुनाव आते-आते सरकार महंगाई पर कुछ राहत देकर जनता के गुस्से को शांत करने में सफल होगी?

क्या 2027 में जनता देगी ‘महंगाई की मार’ का जवाब?

राजनीतिक रूप से देखा जाए तो 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन महंगाई का मुद्दा धीरे-धीरे जमीन पकड़ता है तो इसका असर चुनावी माहौल पर पड़ सकता है। सरकार के सामने चुनौती सिर्फ चीनी के दाम नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि रसोई के पूरे बजट को राहत देने की होगी।

अब देखना यह होगा कि आने वाले महीनों में चीनी और अन्य जरूरी खाद्य वस्तुओं के दाम किस दिशा में जाते हैं और सरकार आम उपभोक्ताओं को कितनी राहत दे पाती है। फिलहाल बदायूं से लेकर प्रदेश के बाजारों तक एक सवाल तेजी से चर्चा में है- “महंगाई के जिस नारे ने 2014 में सत्ता बदलने का माहौल बनाया था, क्या 2027 में उसी महंगाई का मुद्दा उत्तर प्रदेश में नई राजनीतिक कहानी लिखेगा?”

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