
लखनऊ से बड़ी राजनीतिक खबर सामने आई है। भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक विस्तार के तहत 11 जिलों के जिलाध्यक्षों के नामों की घोषणा कर दी है। खास बात यह रही कि इस सूची में पश्चिमी यूपी के जिला अध्यक्षों के नाम के साथ साथ नेताओं की जाति भी सार्वजनिक की गई है। इसके बाद राजनीतिक हलकों में यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि UGC पर सवर्ण समाज खासतौर से ब्राह्मणों के भारी विरोध के चलते क्या इस बार ब्राह्मण समाज पर सबसे अधिक फोकस किया गया है?
यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी ने जिन जिलाध्यक्षों के नाम घोषित किए हैं, उनमें पश्चिमी यूपी, अवध, ब्रज, काशी और गोरखपुर क्षेत्र को संतुलन साधते हुए प्रतिनिधित्व दिया गया है।
पश्चिमी यूपी से घोषित जिलाध्यक्ष
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चार जिलों के अध्यक्ष घोषित किए गए हैं—
- रामजी लाल कश्यप (कश्यप) – शामली
- उदय गिरी गोस्वामी (ब्राह्मण) – अमरोहा
- अजीत सिंह राणा (ठाकुर) – सहारनपुर
- नीरज शर्मा (ब्राह्मण) – बागपत
पीलीभीत समेत अन्य जिलों की घोषणा
- गोकुल प्रसाद मौर्य (मौर्य) – पीलीभीत
- अरविंद गुप्ता (वैश्य ) – लखीमपुर खीरी
- इकबाल बहादुर तिवारी (ब्राह्मण) – गोंडा
- राधेश्याम त्यागी (पासी) – अयोध्या जिला
- कमलेश श्रीवास्तव (कायस्थ) – अयोध्या महानगर
- लाल बहादुर सरोज (पासी) – मीरजापुर
- दीपक मौर्य (मौर्य) – सिद्धार्थनगर
जातीय गणित ने खींचा ध्यान
घोषणा के साथ ही जातिगत आंकड़े भी सामने आए—
- ब्राह्मण – 3
- मौर्य – 2
- पासी – 2
- कश्यप – 1
- ठाकुर – 1
- कायस्थ – 1
- वैश्य – 1
बड़ा सवाल: क्या ब्राह्मण फोकस रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन में जातीय संतुलन साधने की कोशिश तो दिखती है, लेकिन तीन ब्राह्मण जिलाध्यक्षों की नियुक्ति ने यह बहस छेड़ दी है कि UGC कानून के कारण सवर्ण जनता के भारी विरोध और प्रदेश अध्यक्ष बनते ही पंकज चौधरी द्वारा ब्राह्मण विधायकों की मीटिंग को लेकर दी गईं चेतावनी के बाद ब्राह्मण वर्ग में खासी नाराजगी को देखते हुए,, और इसके बाद बसपा और सपा ने ब्राह्मण वर्ग को सम्मान देने के ब्यान के बाद से भाजपा में खलबली देखी जा रही है और इसी के चलते आगामी चुनावी रणनीति के तहत क्या बीजेपी एक बार फिर ब्राह्मण वोट बैंक को साधने की दिशा में आगे बढ़ रही है? खासकर पश्चिमी यूपी और अवध जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में यह फैसला आने वाले दिनों में राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे सकता है।
अब देखना यह होगा कि इन नियुक्तियों का जमीनी स्तर पर संगठन और चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ता है।


























