व्यापारी नेताओं की खुली पोल : पहले अधिकारीयों को उकसाया, फिर व्यापारीयों के बनने लगे मसीहा,
बदायूं। नगर में चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर व्यापारियों के बीच मचे हाहाकार के बीच अधिवक्ता एवं पशु प्रेमी कौशल गुप्ता ने तथाकथित व्यापारी नेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। समाज में हो रही घटनाओं और सरकारी विभागों में व्याप्त गड़बड़ियों पर पैनी नजर रखने वाले कौशल गुप्ता ने कहा कि आज जो नेता खुद को व्यापारियों का मसीहा बता रहे हैं, वही असल में इस संकट के बीज बोने वाले हैं।
कौशल गुप्ता ने कहा कि बदायूं नगर पालिका परिषद द्वारा चलाए जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत जिन दुकानों के दस्तक, टीनशेड और अस्थायी ढांचे तोड़े गए, उससे सैकड़ों छोटे व्यापारी आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुके हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस कार्रवाई को आज “अत्याचार” बताया जा रहा है, उसी की मांग नवंबर–दिसंबर में आयोजित व्यापार बंधु की बैठकों में खुद कुछ व्यापारी नेताओं ने की थी यह दावा है कौशल गुप्ता का।
उन्होंने बताया कि व्यापार बंधु की बैठक में इन नेताओं ने बाजारों में बढ़ते अतिक्रमण को बड़ी समस्या बताते हुए प्रशासन से कठोर कार्रवाई की खुलकर मांग की थी। उस समय न तो छोटे दुकानदारों की रोज़ी-रोटी की चिंता की गई और न ही किसी वैकल्पिक व्यवस्था या पुनर्वास की बात उठाई गई। परिणामस्वरूप, जब नगर पालिका ने उन्हीं मांगों के अनुरूप अभियान चलाया, तो सबसे पहले छोटे और कमजोर व्यापारी इसकी चपेट में आ गए।
कौशल गुप्ता ने तीखे शब्दों में कहा कि आज वही व्यापारी नेता, जो बैठकों में अतिक्रमण हटाने की वकालत कर रहे थे, अब कैमरों के सामने पीड़ित व्यापारियों के साथ खड़े होने का नाटक कर रहे हैं। यह दोहरा चरित्र न सिर्फ व्यापार समाज के साथ विश्वासघात है, बल्कि प्रशासन को भी गुमराह करने वाला है। उन्होंने एक गंभीर सवाल भी खड़ा किया कि कुछ व्यापारी नेता जिनका खुद का कोई व्यापार भी नहीं है वो भी व्यापारी नेता बने हुए है,
उन्होंने सवाल उठाया—
- क्या व्यापार बंधु की बैठकों में उठाए गए मुद्दों की जिम्मेदारी व्यापारी नेता नहीं लेंगे?
- क्या बिना नोटिस, पुनर्वास योजना और वैकल्पिक व्यवस्था के अतिक्रमण हटाना जायज है?
- और सबसे अहम, क्या व्यापारियों की पीड़ा सिर्फ फोटो खिंचवाने और बयानबाजी तक सीमित रह गई है?
कौशल गुप्ता ने कहा कि व्यापार समाज को अब ऐसे अवसरवादी नेतृत्व को पहचानना होगा, जो निजी स्वार्थ और राजनीतिक चमक के लिए पूरे व्यापार वर्ग को संकट में डाल देता है। अगर व्यापारियों की लड़ाई वास्तव में लड़नी है, तो वह ईमानदारी, कानूनी तैयारी, पूर्व योजना और प्रशासन से सार्थक संवाद के साथ लड़ी जानी चाहिए—न कि बैठकों में कुछ और और सड़कों पर कुछ और कहकर।
उल्लेखनीय है कि कौशल गुप्ता इससे पहले भी नगर पालिका द्वारा कूड़ा ढोने के लिए खरीदे गए वाहनों में कथित भ्रष्टाचार को उजागर कर चुके हैं, जिससे उनकी छवि एक जागरूक नागरिक और भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर आवाज़ के रूप में बनी है।
उन्होंने कहा कि व्यापारियों के नाम पर राजनीति करने वाले तथाकथित संगठन अब बेनकाब हो चुके हैं। कथनी और करनी के इस अंतर ने व्यापारी नेतृत्व का असली चेहरा जनता के सामने रख दिया है।


























