बदायूं से प्रदीप कुमार शर्मा ओर इस्लामनगर से ललित मोहन वार्ष्णेय की रिपोर्ट।

बदायूं/इस्लामनगर।कुंदावली गांव में पिछले छह वर्षों से धर्मांतरण की गतिविधियां चल रही थीं, लेकिन पुलिस व खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी। सोशल मीडिया पर युवक के खुलासे के बाद ही मामला सामने आया, फिर भी जांच और कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी है।

मोबाईल से मिलीं धर्मांतरण की ओर इशारा करती 3 तस्वीरें

पकड़े गए लोगों का कहना है कि वे अलापुर क्षेत्र के एक चर्च में प्रार्थना करने जाते हैं। उनका दावा है कि प्रार्थना से दुख-दर्द दूर हो जाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार यह गतिविधियां पिछले छह साल से गुपचुप तरीके से चल रही थीं। कासगंज की एक महिला और एक पुरुष महीने में पांच बार गांव में आकर लोगों को लुभावने संदेश देते थे लेकिन पुलिस का खुफिया सिस्टम भी इसे नहीं भांप सका। उनके मोबाइल से प्रार्थना करते हुए संदिग्ध तस्वीरें और धर्मांतरण से जुड़े दस्तावेज मिले हैं। बावजूद इसके ठोस कानूनी कार्रवाई टालमटोल का शिकार दिख रही है।

प्रशासन और पुलिस पर सवाल?

ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद पुलिस व प्रशासन ने समय रहते कार्रवाई नहीं की। थानाध्यक्ष का कहना है कि तहरीर मिलने के बाद आगे की कार्रवाई होगी, लेकिन सवाल उठता है—क्या इतने साक्ष्य मिलने के बाद भी पुलिस को तहरीर का इंतजार क्यों है?

क्या राजनीतिक दबाव भी है कारण?

  • स्थानीय लोगों का आरोप है कि मिशनरी से जुड़े बदायूं के किसी राजनेता के हस्तक्षेप के कारण मामला दबाने की कोशिश हो रही है। छह साल तक धर्मांतरण चलता रहा, और बीट के सिपाही से लेकर थानेदार तक अनजान रहे—यह प्रशासनिक विफलता नहीं तो क्या है?

बड़ा सवाल–हिंदू संगठन और प्रशासन की धर्मांतरण पर चुप्पी क्यों?

बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और भाजपा के लिए सत्ता मिल जाने के बाद धर्मांतरण कोई मुद्दा नहीं रह गया है। इसी कारण किसी भी संघठन का कोई भी जिला स्तर से लेकर स्थानीय स्तर का पदाधिकारी मौके पर नहीं पहुंच रहे न ही इस मामले को अपेक्षित गंभीरता से उठाने में गंभीरता दिखा रहे है। क्या यह मामला सत्ता ओर राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ रहा है?

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