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बदायूँ: प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह , तीन राज्यों के मुख्यमंत्री, उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल से लेकर प्रदेश के मंत्रियों और विधायकों के प्रचार के बाद भी 35067 वोटों से कियूं हुई भाजपा की हार, पढ़ें स्वदेश केसरी का विश्लेषण।

बदायूँ। 2024 लोकसभा चुनाव के सभी नतीजे आ चुके हैं, देश मे एक बार फिर से NDA गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिल गया है एक दो दिन में नई सरकार का गठन भी हो जायेगा, लेकिन इस बार की नई सरकार अपने सहयोगियों की बैसाखियों पर चलने वाली सरकार होगी, न पहले जैसा जोश न हनक। इसको वक्त के साथ समझौते की सत्ता कहा जा सकता है। इस चुनाव में सबसे बड़ा झटका अगर किसी को लगा है तो व्यक्तिगत मोदी और अमितशाह को लगा है, भाजपा तो अपने परम्परागत वोटों के सहारे 240 सीटें प्राप्त करने में कामयाब रही, लेकिन यह स्थिति तब है जब NDA में खुद बीजेपी सहित 41 पार्टियों का वोट बैंक भी भाजपा को मिला है।

आज हम बदायूँ लोकसभा सीट का विश्लेषण करने पर जानेंगे कि आखिर बदायूँ सीट पर भाजपा का जनाधार कहाँ खिसक गया। 2019 के चुनावों में भाजपा ने यह सीट 18,454 वोट से जीती थी, तब भी इसको मोदी लहर बताया गया था, उस समय संघमित्रा को 511352 वोट मिले और सपा के धर्मेंद्र यादव को 492898 वोट मिले थे। उस समय यह सीट कहने को तो भाजपा की जीत ही कहा जायेगा, लेकिन विश्लेषण जब करेंगे तो विंदू वार आप जानेंगे कि हार की क्या बजह बनी।बसपा को भी 97686(एक लाख के आसपास) बड़ी संख्या में वोट मिले हैं।

किस् विधानसभा में किस पार्टी को मिले कितने वोट कहाँ से हुई जीत कहाँ से हुई हार

गुन्नौर : सपा 122044, भाजपा- 82012, जीत का अंतर- 40,032 बिसौली : सपा- 95861, भाजपा -107656, जीत का अंतर- 11,795 सहसवान सपा 119055, भाजपा- 82950, जीत का अंतर- 36, 105 बिल्सी: सपा- 77044, भाजपा- 90,753, जीत का अंतर- 13,709 • बदायूं : सपा- 87386, भाजपा- 102952, जीत का अंतर- 15,566

इस सारिणी में अंतर को देखकर पाठक समझ ही गये होंगे भाजपा विधायकों के क्षेत्र में कितनी भारी जीत मिली सत्ता रहते हुए और सपा विधायकों के क्षेत्र में क्या हाल है भाजपा का। इन सबमें सबसे बड़ी विचित्र आंकड़े बिसौली विधानसभा क्षेत्र के हैं जहां हारे और जीते हुए दोनों विधायकों का जोर के बाद भी भाजपा को 11795 की लीड मिली है। ?

1.भाजपा में पैसे की राजनीति हावी होना प्रमुख कारण हार का कारण बना, इसका उदाहरण विधायकी व चेयरमैनी के चुनाबों में चैयरमैन का टिकट हो या सभासद का टिकट वितरण दोनों में साफ नजर आया जो भाजपा का पुराना कार्यकर्ता था वह आवेदन करता रह गया वहीं सपा भाजपा बसपा तीनों पार्टियों में पैसे के बल पर टिकट मांगने वालों को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया, बाद में ऐसे लोगों ने जीतने के बाद भाजपा के बरिष्ठ व पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान तो दूर उनके काम न करके उनका अपमान भी किया। जो सपा की सरकार में धर्मेंद्र यादव या सपा विधायकों के खास हुआ करते थे वही सब पैसे के बल पर भाजपा की अग्रणी पंक्ति में बैठे नज़र आने लगे, जिसके कारण पुराना कार्यकर्ता हतोत्साहित हो गया। यही हाल प्रधानी के चुनाव के चुनाबों में दिखा।

2- भाजपा विधायकों के दरबार मे ठेकेदारों व दलालों की पहुंच सीधे किचन तक पुराना कार्यकर्ता गेट तक सीमित हो गया, सपा व बसपा का चुनाव लड़ाने वाले लोग पैसे के बल पर विधायको व संगठन के बरिष्ठ पदाधिकारियों के खासमखास हो गए।

3- बदायूँ में भाजपा गुटबाज़ी साफ़ नज़र आती है चाहें बदायूँ नगर विधायक व नगर पालिका अध्यक्ष की लड़ाई जग जाहिर थी लेकिन संगठन ने उसे कभी गम्भीरता से नहीं लिया, नतीज़ा चेयरमैनी में हार,

4- उझानी सहसवान बिल्सी हो या बिसौली चाहें बजीरगंज हों या कुंवरगांव या अलापुर सभी जगह चेयरमैनी के चुनाबों में संगठन ने स्थानीय स्तर के पुराने नेताओं को बिना बिस्वास में लिये प्रत्याशी थोपे नतीज़ा जिले में भारी हार रही, इसी कारण धीरे धीरे संगठन का पुराना कार्यकर्ता भाजपा के साथ रहते हुए भी या तो वोट नहीं करता या अंदर ही अंदर खिलाफ प्रत्याशी को वोट देने लगा। यही कारण रहा कि विधानसभा के चुनावों में 3 सीटें हाथ से निकल गईं, लेकिन भाजपा संगठन ने फिर भी सीख नहीं ली, उनको लगने लगा अब जनता पर योगी मोदी की भक्ति सर चढ़ कर बोल रही है अब उनको कोई नहीं हरा सकता, संगठन में पद पाना हो या ढेकेदारी सभी काम में पैसा हावी हो गया।

2024 के लोकसभा चुनाव के बारे में स्वदेश केसरी को बहुत से पुराने कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर पहले ही बताया था कि इस बार तो यह हालत देखे गए कि भाजपा के तमाम पुराने आरएसएस से जुड़े लोगों व भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं को किसी ने न तो फोन किया न ही कोई उनसे वोट मांगने घर गया ,प्रत्याशी को केवल बड़े व्यवसायिक घरानों में दबाब बनाकर मोटा चंदा मांगने के लिये ले जाया गया,जिससे भी लोग नाराज़ हो गए, इन सभी लोगों ने स्वदेश केसरी को पहले ही बता दिया था कि हम बदायूँ , आंवला दोनों ही सीटें भाजपा कार्यकर्ताओं के कारण ही हारेंगे।इस बार का चुनाब केवल प्रधानमंत्री, गृहमन्त्री, मुख्यमंत्री, मंत्री विधायकों के सहारे लड़ा गया, नतीज़ा सबके सामने है।

सपा के गढ़ में कैसे कमल खिला था कैसे मुरझा गया

जब 2014 के आम चुनावों में देश में मोदी नाम की आंधी चल रही थी उस समय भी बदायूँ सीट पर उस लहर का कोई असर नहीं हुआ उस दौरान भी सपा ने इस सीट पर अपना परचम लहराते हुए बड़े अंतर से जीत हासिल की ,धर्मेंद्र यादव को 498378 वोट मिले थे वहीं भाजपा प्रत्याशी वागीश पाठक को 3,32,352 वोट मिले सपा ने भाजपा को 1,66,347 वोट से हराया था। जिसे करारी हार कहा गया। अगर हम 2014 और 2019 में सपा को मिले वोटों की तुलना करें तो हम कह सकते हैं केवल 5480 वोट ही कम मिले लेकिन 2014 में सपा का जीत का अंतर एक लाख छियासठ हजार था लेकिन 5480 वोट कम मिलने पर भी सपा 18 हजार वोटों से हार कैसे हो गई थी, आइये जानते हैं इसके पीछे के कुछ प्रमुख कारण, जहाँ सपा को भारी नुकसान वहीं भाजपा को बढ़त कैसे मिल गई,

  • 2019 के चुनावों के दौरान सपा में अंदुरनी कलह चरम पर थी,
  • एक तरफ बदायूँ में सपा का झंडा बुलंद करने वाले बनबारी सिंह यादव का कद धर्मेंद्र यादव के आने के बाद कम कर दिया गया,
  • सपा सांसद व पूर्व विधायक आबिद रज़ा की लड़ाई चरम पर थी आबिद रज़ा को आज़म खान का वरद हस्त मिला हुआ था इसी कारण धर्मेंद्र से सीधे टकराने लगे यह भी एक कारण था।
  • कॉंग्रेस के सलीम इकबाल शेरवानी का लड़ना उनको 51947 वोट मिलना।
  • गुन्नौर विधानसभा क्षेत्र जो यादव बाहुल्य क्षेत्र है वहां पर यादव वोट बैंक का बहुत बड़ा हिस्सा 96531 वोट के रूप में भाजपा प्रत्याशी को मिलना भारी पड़ गया,
  • 2019 के चुनाव में सबसे बड़ी बात यह थी कि इस बार सपा बसपा मिलकर चुनाव लड़ रहे थे। इस गठबंधन के बाद धर्मेंद्र यादव और सपा ओवर कॉन्फिडेंस में आ गए कारण था 2014 के चुनाव में धर्मेंद्र यादव को 1 लाख 66 हजार की लीड और 2014 में बसपा को मिले 1 लाख 56 हजार वोट को जोड़कर इस बार 3 लाख वोटों की जीत समझ बैठे और इसी के चलते सपा ने अपने साथ जुड़े सवर्ण वर्ग के बनिया,ब्राह्मण,ठाकुर,व अन्य समाजों के लोगों को भाव देना बंद कर दिया, उस समय केवल यादव ,मुस्लिम, व एससी के नेताओं को बरियता दी गई, बैसे भी 2009 से ही धर्मेंद्र यादव के आसपास रहने वाली चौकड़ी में केवल यादव,मुस्लिम नेताओं की फौज नज़र आती थी, जिन्हें जनता दलाल अथवा दवंग छवि वालों के रूप में जानती थी, चाहें उनकी बदायूँ की कोठी हो या दिल्ली की चाहें उनका क्षेत्र में कोई कार्यक्रम हो हर जगह उनके साथ एक निश्चित चौकड़ी हर समय घेरे रहती थी जिसके कारण क्षेत्र के लोगों ने धर्मेंद्र यादव से धीरे धीरे दूरियां बना लीं और नतीज़ा चुनाव में हार का मुहू देखना पड़ गया।बदायूँ के कुछ व्यापारी नेता जो राज्य की सत्ता बदलते ही पार्टी बदलने के माहिर खिलाड़ी है वह लोग धर्मेंद्र के विस्वास पात्र दरबारियों में सुमार हो गए थे यह भी एक कारण रहा।
  • अब बदायूँ जनपद में सपा के चाण्डक्य कहे जाने वाले शिवपाल सिंह यादव की एंट्री हो चुकी है आदित्य यादव यहां से सांसद बन चुके है अब देखना होगा की आदित्य यादव के आसपास भी फिर वही धर्मेंद्र यादव की तरह चौकड़ी जमेगी या आम जनता को प्राथमिकता मिलेगी।

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