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Bhaskar Opinion| Indiraji had rightly said- a person should be identified by his deeds, not by his birth | भास्कर ओपिनियन: इंदिराजी ने सही कहा था- व्यक्ति की पहचान जन्म से नहीं, कर्म से होनी चाहिए

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  • भास्कर राय| इंदिराजी ने सही कहा था कि व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से नहीं उसके कर्मों से होनी चाहिए

नई दिल्ली22 मिनट पहलेलेखक: नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

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सन् 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रीवी पर्स वापस ले लिया था। प्रीवी पर्स दरअसल, राजा-महाराजाओं को सरकार की तरफ़ से मिलने वाला जेब खर्च था। देसी राज्यों के भारत गणराज्य में सम्मिलन के वक्त सरकार ने इन राजा-महाराजाओं से वादा किया था कि आपकी उपाधि यानी राजा, महाराजा, कुंवर, नवाब, सर आदि जो भी है, वह आपसे छीनी नहीं जाएगी। आपके महल, अटारी सबकुछ वैसे ही आपके पास रहेंगे। ऊपर से आपकी रियासत के अनुपात में आपको सालाना रक़म भी दी जाएगी। ये सालाना रक़म ही प्रीवी पर्स थी।

आज, इस अवसर पर इसकी चर्चा करने का मतलब सिर्फ़ इतना है कि ये प्रीवी पर्स ख़त्म करते वक्त श्रीमती इंदिरा गांधी ने राजा-महाराजाओं को सलाह दी थी कि व्यक्ति को अपने जन्म से नहीं बल्कि कर्म से पहचाना जाना चाहिए। कालांतर में यही बात लोग श्रीमती इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी के लिए कहने लगे। क्योंकि उन्होंने भी अपने जीवन में कोई संघर्ष करके कुछ पाया नहीं था।

राजा-महाराजाओं के बेटे-बेटियों की तरह वे भी महलों में पले-बढ़े थे। उन्होंने कभी कोई संकट या ये कहें जीवन का संकट नहीं देखा था। यही वजह है कि उनके फ़ैसले भी प्रैक्टिकल नहीं होते थे। कहते हैं इमरजेंसी के वक्त वे अघोषित शासक बन बैठे थे। परिवार नियोजन के नाम पर उनकी बेजा सख़्ती से जो ज़्यादतियाँ हुईं उसे वर्षों तक इस देश ने भुगता।

श्रीमती गांधी का वही वाक्य उनके पोते राहुल गांधी पर भी लागू हो रहा है। वे भी महलों में पले-बढ़े और उन्होंने भी जीवन में कोई संघर्ष नहीं किया या ये कहें कि जीवन के लिए संघर्ष करने की उनके सामने भी कोई नौबत नहीं आई। कहते हैं – “जा के पैर न परी बिवाई, वो क्या जानें पीर पराई”।

जब आप लोगों की पीड़ा को उसी भाव से महसूस नहीं कर पाते तो दूसरों को आपकी बात पर भरोसा नहीं हो पाता। इस भरोसे को पाने के लिए उस पीड़ा को पहले खुद भुगतना होता है। यही वजह है कि राहुल गांधी सच्ची और ठीक बात कहते हैं तब भी लोग उसे उस सच्चाई के साथ, उस रिदम में अंगीकार नहीं कर पाते।

लोग आपकी बात पर भरोसा तब करते हैं जब आप उनके बीच रहते हैं। उनके दुख – दर्द को देखते- महसूस करते हैं और एक तरह से उसे खुद भोगते हैं। गलती राहुल गांधी की नहीं है। उनके परिदृश्य की है। उनके आस पास के माहौल की है। वे कुछ महसूस करना भी चाहते हैं तो आस पास बैठी या खड़ी कांग्रेसी जमात यह होने नहीं देती।

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