नई दिल्ली। चुनावी बॉन्ड एक वचन पत्र की तरह होता है जिसमें भुगतानकर्ता और प्राप्तकर्ता का विवरण होता है। इसकी जानकारी केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को होती है। बॉन्ड विशेष रूप से राजनीतिक दलों को धन के योगदान के लिए जारी किए जाते हैं।

चुनावी बॉन्ड योजना की वैधता पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनावाई करते हुए इस पर रोक लगा दी। कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की आलोचना की और कहा कि राजनीतिक पार्टियों को हो रही फंडिंग की जानकारी मिलना बेहद जरूरी है।

आखिर चुनावी बॉन्ड होता क्या है?
चुनावी बॉन्ड एक वचन पत्र की तरह होता है जिसमें भुगतानकर्ता और प्राप्तकर्ता का विवरण होता है। चुनावी बॉन्ड में लेनदेन में पार्टियों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती है। यही कारण है कि चुनावी बॉन्ड पूरी तरह से गोपनीय होता है। इसकी जानकारी केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को ही होती है।

चुनावी बॉन्ड को कौन खरीद सकता है?
चुनावी बॉन्ड को भारत में कोई भी व्यक्तियों या कंपनी खरीद सकती है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की देशभर में फैली 29 शाखाओं को चुनावी बॉन्ड बेचने के लिए अधिकृत किया गया है। चुनावी बॉन्ड को प्रत्येक वर्ष जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में 10 दिनों के लिए बेचा जाता है। खरीदार की पहचान एसबीआई को छोड़कर सभी के लिए गुमनाम रहती है।

बॉन्ड विशेष रूप से राजनीतिक दलों को धन के योगदान के लिए जारी किए जाते हैं। ये बॉन्ड एसबीआई द्वारा जारी किए जाते हैं और कम से कम 1,000 रुपये में बेचे जाते हैं जबकि अधिकतम सीमा नहीं है। इस योजना के तहत कॉर्पोरेट और यहां तक कि विदेशी संस्थाओं द्वारा दिए गए दान पर 100% कर छूट मिलती है।
दान कैसे किया जाता है?

किसी राजनीतिक दल को दान देने के लिए केवाईसी-कम्प्लेंट अकाउंट के जरिए बॉन्ड खरीदे जा सकते हैं। राजनीतिक दलों को बॉन्ड प्राप्त होने के 15 दिन के भीतर उसे भुनाना होता है। कोई भी व्यक्ति या कंपनी कितने चुनावी बॉन्ड खरीद सकती है, इसकी संख्या तय नहीं है।

चुनावी बॉन्ड के जरिए कौन धन प्राप्त कर सकता है?
चुनावी बॉन्ड के जरिए धन प्राप्त करने वाले राजनीतिक दलों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत होना चाहिए। इसके साथ ही इन दलों को पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनावों में डाले गए वोटों का कम से कम एक प्रतिशत वोट मिले हों।

चुनावी बॉन्ड के लिए नियम कानून क्या हैं?
जनवरी 2018 में केंद्र सरकार ने चुनावी बॉन्ड की योजना को अधिसूचित किया था। सरकार ने कहा था कि यह कदम देश में राजनीतिक फंडिंग की व्यवस्था को साफ करने के लिए उठाया गया है। पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 का केंद्रीय बजट पेश करते हुए कहा था कि आजादी के 70 साल बाद देश राजनीतिक दलों को वित्त पोषित करने का एक पारदर्शी तरीका विकसित नहीं कर पाया है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनावी बॉन्ड योजना को अदालत चुनौती क्यों मिली?
दो गैर-सरकारी संगठनों एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और कॉमन कॉज और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने चुनावी बॉन्ड योजना को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि इस योजना से राजनीतिक फंडिंग में गैर-पारदर्शिता की अनुमति दी गई और बड़े पैमाने पर चुनावी भ्रष्टाचार को वैध बनाया गया।

इसके बाद अप्रैल 2019 में उस वक्त के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने सभी राजनीतिक दलों को दान, दानदाताओं और बैंक खाता संख्या का विवरण एक सीलबंद कवर में ईसीआई को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। बेंच ने यह कहते हुए योजना के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से परहेज किया कि ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन सुनवाई की आवश्यकता होगी।

इस आदेश के बाद याचिकाकर्ताओं ने कई बार अदालत का दरवाजा खटखटाया। 2021 की शुरुआत में एडीआर ने बॉन्ड योजना पर रोक लगाने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया। अक्टूबर 2023 में याचिकाकर्ताओं ने 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले मामले की सुनवाई की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया।

इसके बाद 31 अक्टूबर 2023 को सीजेआई चंद्रचूड़ के नेतृत्व में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने तीन दिनों तक दलीलें सुनीं। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि चुनावी बॉन्ड योजना से कॉर्पोरेट फंडिंग, काले धन का बढ़ावा और भ्रष्टाचार बढ़ा है। उन्होंने तर्क दिया कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों के धन के स्रोत के बारे में जानकारी पाने का अधिकार है। वहीं सरकार ने तर्क दिया कि यह योजना दानकर्ताओं की गोपनीयता और निजता के अधिकार की गारंटी देने के लिए बनाई गई थी। इस तरह से 2 नवंबर 2023 को संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

अब अदालत ने क्या फैसला सुनाया है?
सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया और सरकार को किसी अन्य विकल्प पर विचार करने को कहा है। पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से इस योजना के साथ-साथ आयकर अधिनियम और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में किए गए संशोधनों को भी रद्द कर दिया। न्यायालय ने कई निर्देश भी जारी किए, जिसमें 12 अप्रैल, 2019 से राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त और भुनाए गए चुनावी बॉन्ड के विवरण को सार्वजनिक करना भी शामिल है।

कोर्ट ने केंद्र सरकार की इस दलील को इसको खारिज कर दिया कि यह योजना पारदर्शी है। न्यायालय ने राय दी कि ऐसे चुनावी बॉन्ड काले धन पर अंकुश लगाने वाले उपाय नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की आलोचना करते हुए कहा कि राजनीतिक पार्टियों को हो रही फंडिंग की जानकारी मिलना बेहद जरूरी है। इलेक्टोरल बॉन्ड सूचना के अधिकार का उल्लंघन हैं।

करने को कहा है। पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से इस योजना के साथ-साथ आयकर अधिनियम और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में किए गए संशोधनों को भी रद्द कर दिया। न्यायालय ने कई निर्देश भी जारी किए, जिसमें 12 अप्रैल, 2019 से राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त और भुनाए गए चुनावी बॉन्ड के विवरण को सार्वजनिक करना भी शामिल है।

कोर्ट ने केंद्र सरकार की इस दलील को इसको खारिज कर दिया कि यह योजना पारदर्शी है। न्यायालय ने राय दी कि ऐसे चुनावी बॉन्ड काले धन पर अंकुश लगाने वाले उपाय नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की आलोचना करते हुए कहा कि राजनीतिक पार्टियों को हो रही फंडिंग की जानकारी मिलना बेहद जरूरी है। इलेक्टोरल बॉन्ड सूचना के अधिकार का उल्लंघन हैं।

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