
दिल्ली में प्रेसवार्ता करते पूर्व सांसद सलीम शेरबानी।स्रोत-स्वयं
बदायूं। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले पांच बार के सांसद और पूर्व केंद्रीय विदेशी राज्यमंत्री सलीम शेरवानी ने शनिवार को राष्ट्रीय महासचिव पद छोड़कर सपा को झटका दे दिया। सलीम शेरवानी और सपा के बीच 2009 से ही अदावत चल रही है। दिल्ली में इस घोषणा के दौरान उनके साथ पूर्व विधायक आबिद रजा भी रहे।
दरअसल, वह सपा से राज्यसभा जाना चाहते थे। उनसे वादा भी किया गया था। सपा ने तीन राज्यसभा प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया तो उनका नाम नहीं था। इसके बाद से ही शेरवानी की ओर से कोई कदम उठाने के कयास लगाए जा रहे थे। वह पहली बार बदायूं लोकसभा सीट से 1984 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। 1989 में उन्होंने एटा और 1991 में फिर बदायूं लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। 1996 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर सपा का दामन थाम लिया और 1996, 98, 99 और 2004 में लगातार सपा से बदायूं के सांसद चुने गए। 2009 में सपा ने उनका टिकट काटकर धर्मेद्र यादव को प्रत्याशी बनाया। शेरवानी ने कांग्रेस से चुनाव लगा। वह चुनाव हार गए। इसके बाद वह बदायूं और आंवला लोकसभा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते आ रहे थे।
फिर से सपा में आने पर उनसे राज्यसभा भेजने का वादा किया गया था। 2017 और 2022 के बाद इस बार भी सपा ने उनको राज्यसभा प्रत्याशी नहीं बनाया। शेरवानी को उम्मीद थी कि पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक गठजोड़ के तहत सपा उनको राज्यसभा प्रत्याशी बनाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद शेरवानी की नाराजगी सामने आई है। राजनीतिक गलियारों में अब कई तरह की चर्चाएं होने लगी हैं।

























