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प्रवीन सचदेवा आज भी निभा रहे सदियों से चली आ रही नदी में ताँवे के सिक्के डालने की परंपरा, नई पीढ़ी से अपनाने को कर रहे प्रेरित।

बदायूँ।यूं तो नदी में सिक्के डालने की परंपरा सालों से चली आ रही है। आखिर हम नदी में सिक्का क्यों डालते हैं? इस रिवाज के पीछे एक बड़ी वजह छिपी हुई है। दरअसल, जिस समय नदी में सिक्का डालने की यह प्रथा या रिवाज शुरू हुआ था, उस समय में आज के स्टील के सिक्के की तरह नहीं बल्कि तांबे के सिक्के चला करते थे और तांबा जीवन और सेहत के लिए कितना फायदेमंद होता है, यह शायद आप बेहतर जानते होंगे। पहले के ज़माने में पानी का मुख्य स्रोत नदियां ही हुआ करती थीं। लोग हर काम में नदियों के पानी का ही इस्तेमाल किया करते थे। चूंकि तांबा पानी के प्यूरीफिकेशन करने में काम आता है और ये नदियों के प्रदूषित पानी को शुद्ध करने का एक बेहतर प्यूरीफायर भी रहा है इसलिए लोग जब भी गंगा नदी या किसी तालाब के पास से गुजरते थे, तो उसमें तांबे का सिक्का डाल दिया करते थे। आज तांबे के सिक्के चलन में नहीं है, लेकिन फिर भी तब से चली आ रही इस प्रथा को लोग आज भी मान रहे हैं।

बदायूँ में इस परम्परा को आज भी जीवित किये हुए है एक नौजवान व्यापारी , आइए जानते हैं इस पीढ़ी के व्यापारी के बारे में, बदायूँ से 13 किलोमीटर दूर पंजाबी कालोनी उझानी के निवासी प्रवीन सचदेवा, इनका बदायूँ में नानक इलेक्ट्रिकल के नाम से जोगीपुरा लक्ष्मी लॉन में होलसेल व रिटेल बड़ा व्यापार है, कहने को तो इनकी दिनचर्या अति व्यस्त है सुबह से देर रात तक अपने व्यवसाय में व्यस्त रहना इनका रूटीन है, लेकिन अपने अति व्यस्त समय मे भी अपने परिवार व अपने दोस्तों व सुभचिंतको के लिये समय निकाल कर सम्बन्धों को हरा भरा रखना कोई इनसे सीखे,इनके व्यवहार की खूबियों के बारे में कभी आगे विस्तार से चर्चा करेंगे आज हम जिस खूबी के बारे में आपको बताने जा रहे हैं वो है हमारी सदियों से चली रही एक ऐसी परम्परा के बारे में आपने अक्सर देखा होगा कि आज भी हम लोग जब भी किसी गंगा नदी में स्नान करते हैं या उसके ऊपर से गुजरते है तो हम सभी उसमें दान स्वरूप उसमे सिक्के डाल देते हैं गंगा ,नदी या तालाब में सिक्के डालने की परंपरा सैकड़ो बर्षो से चली आ रही है लेकिन आज की पीढ़ी के लोगों के लिये सिर्फ धार्मिक महत्व के रूप में है लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोगों का कहना है कि आज जो लोग गंगा में सिक्के डालते हैं वो स्टील या लोहे के बने होते हैं इनको गंगा में डालने से सिर्फ दान तो माना जा सकता है लेकिन इसके पीछे के वैज्ञानिक कारण को नई पीढ़ी नहीं जानती है,जिसको उन्हें बताने की जरूरत है, लेकिन बदायूँ का यह नौजवान व्यापारी जो अपने बुजुर्गों से सीखी पुरानी परम्पराओं को आज भी बदस्तूर निभा रहा है। सचदेवा जब भी गंगा स्नान के लिये जाते हैं तो अपने साथ सैकड़ों की संख्या में तांबे के सिक्कों को अपने साथ ले जाते हैं जो गंगा में डालकर आते हैं उनका कहना है यह आहूति बिल्कुल सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है लेकिन उनका यह सार्थक प्रयास है,जहां सरकार गंगा जल की सफाई व उसके शुद्धि के लिये हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है अगर हमारी नई पीढ़ी अपनी पुरानी परम्पराओं को अपनाने लगे तो गंगा का जल जल्द ही शुद्ध हो जाएगा,इसके लिए हमे अपनी नई पीढ़ी को तांबे का महत्व समझाते हुए उसको जागरूक करने की जरूरत है इसके लिए हम सबको प्रयास करना होगा।स्वदेश केसरी ने जब उनसे सवाल किया जब तांबे के सिक्के प्रचलन में नहीं है ऐसी स्थिति में नई पीढ़ी कैसे इस परम्परा को आगे बढ़ा सकती है तो उनका कहना है कि जरूरी नहीं है कि आप तांबे के सिक्के को ही जल में डाले इसके बदले आप तांबे के वारसर भी डाल सकते हैं जो आसानी से मार्केट में उपलब्ध रहते हैं,

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