बदायूँ के पॉश इलाके पथिक चौक से लेकर नवादा तक जहां की तहां थमीं गाडिय़ां और चहुंओर हॉर्न की तेज आवाज। हर कोई आगे निकलने ही होड़ में, मगर आगे बढऩे के लिए जगह ही नहीं। सबको सिर्फ खुद के उबर जाने की जल्दी, दूसरों की परवाह किसी को नहीं। नियमों और यातायात व्यवस्था की फिक्र करने वाला भी कोई नहीं।


ऐसा ही माजरा था, शुक्रवार की रात सात बजे से पथिक चौक से जब मैं भोलाधाम के सामने पहुंचा। हल्की ठंड में भी पसीने छूटने लगे। जी घबराने लगा। लेकिन क्या करता? जल्दी निकलने की होड़ में वाहन आड़े-तिरछे होकर इस कदर घुसे और एक-दूसरे से सटे हुए थे कि आधे हाथ जितनी जगह भी नहीं थी। तिस पर विडम्बना यह कि यहां यातायात पुलिसकर्मी प्राय: नहीं रहते। वाहन चालक मनमर्जी से चलते हैं। भले ही यातायात बाधित हो। या किसी की जान पर बन आए। खासी मशक्कत के बाद भी प्रोफेसर कालोनी की तरफ जाने के लिए विरूआवारी पार नहीं कर पाया । दो मिनट का रास्ता जैसे-तैसे 50-55 मिनट में तय कर नवादा पहुंचा। वहां भी हालात ज्यादा अच्छे नहीं थे। चहुंओर से यातायात बेतरतीब आ रहा था मगर देखने वाला कोई नहीं था। वहां लगे जाम में दुल्हन की तरह सजीं कारें भी फंसी हुई थीं। एक लग्जरी गाड़ी में बैठी दुल्हन और उसके परिजन प्रशासन को कोस रहे थे। लोगों से कह रहे थे, थोड़ा सहयोग करो, निकलने दो, मुहूर्त निकल जाएगा। आंखों से आंसू छलकने को थे। आखिर 3-4 लोग अपनी गाडिय़ों से उतरे, यातायात सुचारू करने में मदद की। इस रोड पर 2-3 बारातें निकल रही थीं। लोग गाडिय़ों में बैठे परेशान होते रहे, बाराती नाचते रहे।चुनाव होने के कारण इस रोड पर प्रमुख पार्टी के प्रत्याशी के निवास और कार्यालय और कार्यकर्ता भी जाम का कारण बनते दिखे। जगह-जगह जाम से सामना हुआ तो आरजू फिल्म का वह गाना याद आ गया, हूजूर हमसे बचके कहां जाइएगा, जहां जाइएगा हमें पाइएगा..।

























