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टीएमयू में फ्रंट वारियर्स ने साझा किए अपने अनुभव

कोरोना की संभावित तीसरी लहर को लेकर तैयारियों पर भी हुआ गहन मंथन

मेडिसिन के सीनियर प्रोफेसर डॉ. जिगर हरिया ने कोरोना ड्यूटी के वक्त मरीजों के इलाज में आई तकलीफों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा, फर्स्ट फेज़ में कोविड नई बीमारी थी। कौन-सी दवाई काम करेगी, कौन-सी नहीं करेगी, ऐसे सवालों को लेकर डॉक्टर्स उलझन में थे। वह बोले, डॉक्टरों के सामने यह बड़ी चुनौती थी, कोरोना मरीजों और उनके तीमारदारों के सवालों के जवाब क्या दें? डॉ. हरिया बोले, धीरे-धीरे दवाइयां भी बदलती गई। सरकार की तरफ से भी तरह की दवाइयां आई। प्लाज़्मा के जरिए भी इलाज संभव हुआ। अंततः प्लाज़्मा से ट्रीटमेंट कारगर साबित नहीं हुआ। पीपीई किट पहनकर गर्मी में इलाज करने का डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को ट्रीटमेंट का एकदम नया वातावरण मिला। गॉगल्स में जमी भांप के कारण देखने में परेशानी हुई। मास्क पहनकर संवाद में भी काफी दुश्वारी हुई। डॉ. हरिया ने बताया, ड्यूटी के दौरान घर से बाहर रहने पर डॉक्टरों के परिजनों ने अपने को जैसे -तैसे संभाला। मन में हमेशा डर रहता था कि अगर मुझे कोरोना हुआ तो आगे क्या होगा? मुझसे मेरे परिवार को हुआ तो फिर क्या होगा? वह तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज एंड रिचार्ज सेंटर-टीएमएमसी एंड आरसी की ओर से आयोजित मेडिकल एथिक्स पर आयोजित सेमिनार में बोल रहे थे। टीएमएमसी एंड आरसी की प्राचार्या डॉ. श्यामोली दत्ता ने माँ सरवस्ती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके सेमिनार का श्रीगणेश किया। इस मौके पर डॉ. दत्ता ने डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की निस्वार्थ भाव की सेवा की सराहना करते हुए आगे आने वाली हर चुनौती के लिए प्रेरित किया। इस मौके पर मेडिकल कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल डॉ. एसके जैन, डिप्टी उपाध्यक्ष डॉ. अजय पंत, डॉ. अजय सराफ, डॉ. रूपा राज भंडारी, डॉ. सुधीर गुप्ता, डॉ. उमर फ़ारूक़, डॉ. निधि शर्मा, डॉ. फरहा अख्तर, डॉ. शिल्पा रेड्डी, डॉ. श्वेता शर्मा, डॉ. अनमोल गेरा, श्रीमती सीके वाजपेयी आदि की गरिमामयी मौजूदगी रही।

मनोरोग विशेषज्ञ की प्रोफेसर डॉ. प्रेरणा गुप्ता ने कोरोना के कारण लोगों में मानसिक दबाव पर बोलीं, कोरोना की अचानक आई बीमारी से चिकित्सा संसाधनों में कमी के कारण मरीजों में चिंता, घबराहट, डिप्रेशन, परिवार से दूर रहना, अस्पताल में दूसरे मरीजों के साथ रहना आदि दुश्वारियों का सामना करना पड़ा है। इससे मरीजों के मनोबल में भी कमी आई। डॉ. गुप्ता बोलीं, डॉक्टर के पीपीई किट पहनने के कारण मरीज से दूरी हो जाने पर भी मरीजों में मानसिक परेशानी बढ़ी हैं। उन्होंने बताया, ऐसी दिक्क्तों से ग्रस्त मरीजों और स्टाफ के लिए मनोरोग के डॉक्टर्स ने उनकी पर्सनल काउंसलिंग कर उनकी समस्याओं को दूर करने के प्रयास किए। अंत में बोलीं, कोरोना को छुआछूत की बीमारी न बनाएं, हमें इसमें मरीज को संबल देने की जरूरत है।

एनेस्थीसिया की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पायल जैन ने कोविड वेव-1 और कोविड वेव-2 के पर चर्चा करते हुए बताया, कोविड वेव-1 के मुकाबले कोविड वेव-2 में इन्फेक्शन रेट बहुत था। कोविड वेव-1 के बाद लोगों ने कोविड को हल्के में लेना शुरू कर दिया था, लेकिन कोविड वेव-2 में आए कोविड के नए-नए वेरिएंट के कारण इन्फेक्शन बहुत फैल रहा था। कोविड वेव-1 से कोविड वेव-2 में हमारे पास दवाइयों की अधिक जानकारी थी। कोविड वेव-1 से कोविड वेव-2 में सेनिटाइज़र, मास्क की ब्लैक मार्केटिंग पर रोक लगी। कोविड वेव-1 में 70-80 वर्ष की आयु जबकि कोविड वेव-2 40-50 वर्ष की आयु के लोगों पर अधिक प्रभाव डाला।

ऑर्थोपेडिक विभाग के डॉ. अमित सराफ ने इम्पोर्टेंस ऑफ़ टीम वर्क इन मैनेजिंग पेंडेमिक पर अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, कोरोना इलाज के समय टीम वर्क बहुत ही महत्वपूर्ण था। अगर हम टीम बनाकर काम करते हैं तो हम अलग-अलग कई तरह के काम कर सकते हैं। टीम में काम करने से समय की बचत होती है। टीम में हमेशा अगल-अलग फील्ड के लोग होने चाहिए, जिससे हर तरह की समस्या से आसानी से निपटा जा सके। डॉ. सराफ ने बताया, कोरोना के दौरान टीम वर्क करने से डॉक्टर्स को अपने मूल विषयों से हटकर और विषयों की भी जानकारी प्राप्त करने का मौका मिला।

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