तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के शिक्षा संकाय की ओर से सात दिनी फैकल्टी डवलपमेंट प्रोग्राम – एफडीपी
यूपी,राजस्थान,दिल्ली,हरियाणा समेत 22 सूबों के शिक्षाविदों ने एफडीपी में की शिरकत
- शिक्षा को प्रारम्भ से ही सैद्धान्तिक के संग – संग व्यावहारिक भी होनी चाहिए: प्रो. जैन
- रिसर्च में आधुनिक तकनीकी का उपयोग को अति आवश्यक : प्रो. सिंह
- गुरू अपने शिष्यों को शास्त्र अध्यापन के साथ शस्त्र विद्या में भी बनाते हैं निपुण : डॉ. प्रभात
- डाॅ. दुबे ने नैक एक्रेडेशन के लिए मात्रात्मक और गुणात्मक बिन्दुओं पर विस्तार से डाला प्रकाश
- टीएमयू रजिस्ट्रार ने भारतीय शिक्षा के इतिहास, विकास और भविष्य की संभावनाओं पर दिया व्याख्यान
- डाॅ. जैन बोलीं, भविष्य में आधुनिक ऑनलाइन तकनीकों का प्रयोग शिक्षा की आवश्यकता के रूप में विकसित होगा
- अन्त में टीएमयू के निदेशक छात्र कल्याण प्रो. सिंह ने एफडीपी में विशेषज्ञ प्रो0 बीएल जैन समेत शामिल विद्वान आचार्यों का धन्यवाद ज्ञापित किया
तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रघुवीर सिंह ने भारतीय शिक्षा के बदलते वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा करते हुए पाठ्यक्रम को आउटकम आधारित बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही शिक्षण कार्य को व्याख्यान आधारित न रखकर बहुआयामी बनाने का सुझाव दिया। सामुदायिक सहभागिता, अन्तर्वैयक्तिक संबंधों का विकास एवं तकनीकी आधारित शिक्षण पद्धति विकसित करने की भी पुरजोर वकालत की। प्रो. सिहं ने यूजीसी के पत्र का भी उल्लेख किया, जिसमें 40 प्रतिशत पाठ्यक्रम ऑनलाइन शिक्षण पद्धति पर होना आवश्यक माना गया है। उन्होंने बताया, कारपोरेट हाउस चाहते हैं कि कुशल नेतृत्व क्षमता के विकास के लिए बदलते हुए तकनीकी परिदृश्य में स्वयं को अपडेट रखने की आवश्यकता है। प्रो. सिंह तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय की ओर से शिक्षा विभाग में सात दिवसीय फैकल्टी डवलपमेंट कार्यक्रम – एफडीपी में बोल रहे थे। इससे पूर्व छात्र कल्याण निदेशक प्रो. एमपी सिंह ने कुलपति प्रो. रघुवीर सिंह का स्वागत किया। एफडीपी में 22 राज्यों राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, उप्र, प.बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, गुजरात, असम, सिक्किम, हरियाणा आदि के शिक्षाविदों ने जूम ऐप और यूट्यूब के माध्यम से शिरकत की।
जैन विश्व भारती संस्थान, मान्य विश्वविद्यालय, लाडनॅू – राजस्थान के विभागाध्यक्ष प्रो. बी.एल. जैन ने कहा, शिक्षा को प्रारम्भ से ही सैद्धान्तिक के साथ व्यावहारिक भी होनी चाहिए तभी शिक्षा के जरिए धनोपार्जन किया जा सकता है। डाॅ जैन ने लाॅकडाउन की परिस्थितियों में तकनीकी ज्ञान के अनुप्रयोग को बढ़ाने की आवश्यकता बताई। धन कमाने के लिए प्रो. जैन ने स्थानीय परिवेश की वस्तुओं के निर्माण में कौशल निपुणता विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही यह भी बताया कि व्यक्ति अथवा बालक को सम्पत्ति बोध होने का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। प्रो. जैन ने धन कमाने की प्रक्रिया में आलोचना से नहीं घबराने का मंत्र दिया। ऐसे में संयम की ताकत को महत्वपूर्ण बताया।
इन्दिरा गांधी नेशनल सेन्टर फाॅर द आर्ट, मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर, नई दिल्ली के रिसर्च ऑफिसर डाॅ0 जसवीर सिंह ने मिजरिंग द रिसर्च विजिब्लिटी थ्रो एकेडेमिक आइडेंटिफायर्स पर शोध कार्यों में आधुनिक तकनीकी के उपयोग को अति आवश्यक बताया। साथ ही शोध कार्याें को व्यापक बनाने के लिए उन्होंने गूगल स्काॅलर, आर्किड एकाउन्ट, आई.आर.एन.एस. एकाउन्ट बनाने की विधि का तकनीकी प्रशिक्षण दिया। सत्यनाम सत्यगुरू बी.एड. काॅलेज, मुजफ्फरनगर, बिहार के प्राचार्य डाॅ. पीयूश राज प्रभात ने कहा, नवाचार तो हमारी शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में गुरूकुल की प्राचीन प्रणाली से चला आ रहा है, जहाॅ गुरू अपने शिष्यों को शास्त्र अध्यापन के साथ शस्त्र विद्या में भी निपुण बनाते है।
तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार डाॅ. आदित्य शर्मा ने इवालविंग सीनेरियो आफ हायर एजूकेशन इन इण्डिया पर भारतीय शिक्षा के इतिहास, विकास और भविष्य की संभावनाओं पर प्रभावी व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था का स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर वर्तमान तक की समीक्षात्मक स्थिति को स्पष्ट किया। डाॅ0 शर्मा ने वर्तमान में मशीन आधारित शिक्षण व्यवस्था को कोविड परिस्थिति में वरदान बताया। टीएमयू की एसोसिएट डीन एकडेमिक डाॅ. मंजुला जैन बोलीं, भारत युवाओं का देश है। युवा शिक्षण तकनीकी आधारित अनुप्रयोग सुनिश्चित कर समाज एवं राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकते हैं। डाॅ. जैन ने बताया कि भविष्य में आधुनिक ऑनलाइन तकनीकों का प्रयोग शिक्षा की आवश्यकता के रूप में विकसित होगा।
केएन मोदी यूनिवर्सिटी – नेवाई, राजस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. जे.पी दुबे ने काॅलेजों एवं विश्वविद्यालय के लिए शैक्षिक गुणवत्ता को उन्नत बनाने के नैक की अनिवार्यता को स्पष्ट किया। डाॅ. दुबे ने नैक एक्रेडेशन हेतु अपनाए जाने वाले मात्रात्मक एवं गुणात्मक बिन्दुओं को विस्तार से बताया। डाॅ. दुबे ने काॅलेजों विश्वविद्यालयों द्वारा नैक हेतु एसएसआर तैयार करने के लिए अपनाये जाने वाले विभिन्न आयामों जैसे शिक्षण अधिगम एवं आंकलन, शोध नवाचार एवं संवर्धन, इन्फ्रास्ट्रक्चर, गर्वनेन्स लीडरशिप एवं मैनेजमेन्ट, संस्थागत मूल्य और बेस्ट प्रैक्टिसेज को विस्तार पूर्वक समझाया। डाॅ दुबे ने नैक के प्रारम्भिक चरण की तैयारी और अग्रिम चरण को स्पष्ट किया।
राजस्थान शिक्षा महाविद्यालय- जयपुर, राजस्थान के सहायक प्राध्यापक डाॅ. सम्पर्क आचार्य ने बदलते परिदृश्य पर बोलते हुए कहा, ऑनलाइन लर्निंग आर्टिफिशियल इंटैलिजेन्सी, क्लाउड बेस्ड सल्यूशन, वर्चुअल रियलिटी का शिक्षा में अनुप्रयोग और सब्सक्रिप्शन बेस्ड लर्निंग के प्रयोग की प्रयोगिकता भविष्य की शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करेगी।
कम्बैक्टिंग प्लैगरिज्मः प्रिवेन्टिव अप्लीकेशन एण्ड टूल्स पर बीआर अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के लाइब्रेरियन डाॅ. ओ.पी. सैनी ने बताया, साहित्यिक चोरी बौद्धिक जगत के लिए शर्मसार करने वाला अपराध है। इससे शोध की मौलिकता एवं विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। डाॅ. सैनी ने कहा, आज विश्व का सम्पूर्ण ज्ञान इन्टरनेट पर उपलब्ध है, इसीलिए प्लैगरिज्म की आवश्यकता अत्यधिक है। उन्होने विभिन्न प्रकार के प्लैगरिज्म जैसे क्लोन प्लैगरिज्म, रिमिक्स प्लैगरिज्म, ctrl+प्लैगरिज्म, हाइब्रिड, फाइन्ड रिप्लेस, रिसाइकिल, मैशअप प्लैगरिज्म इत्यादि के बारे में विस्तार पूर्वक बताया।
अन्त में टीएमयू के निदेशक छात्र कल्याण प्रो. सिंह ने आज के विशेषज्ञ प्रो0 बीएल जैन का आभार व्यक्त किया। साथ ही सात दिनी एफडीपी में शामिल सभी विद्वान आचार्यों का धन्यवाद ज्ञापित किया। एफडीपी में प्रो. रशिम मेहरोत्रा, डाॅ. विनोद जैन, श्री रंजीत सिंह, डाॅ. त्रिलोक पाठक, स्वाति बिसारिया, डाॅ. हर्षवर्धन, डाॅ. विनय कुमार, श्री राहुल कुमार, रचना सक्सेना, शिवांकी रानी आदि ने भाग लिया। संचालन रूबी शर्मा ने किया।





















