बेंगलुरु से चार जाने-माने वैज्ञानिक वर्चुअली देंगे ट्रेनिंग
खास बातें
रिसर्च एंड डवलपमेंट सेंटर-आरडीसी की पहल पर होगी वर्कशॉप
श्राडिंगर के वैज्ञानिक प्रितेश, विनोद, कौशिक, प्रज्ज्वल होंगे रूबरू
घातक वायरस को कारगर ड्रग से खत्म करने के जानेंगे तरीके
वर्कशॉप में शामिल होंगे चार कॉलेजों के 80 से अधिक प्रतिभागी
टीएमयू के वीसी प्रो. रघुवीर सिंह करेंगे वर्कशॉप का शुभारम्भ
पर्यावरण संरक्षण में कम्प्यूटेशनल मेथड इन ड्रग डिस्कवरी एक वरदान
ड्रग निर्माण प्रक्रिया में कम्प्यूटेशनल मेथड वरदान बनकर उभरा है। इस प्रक्रिया के क्रियान्वन से न केवल पर्यावरण संरक्षण होता है, बल्कि विषैले बैक्टीरिया/ वायरस को चिन्हित करने, कारगर ड्रग की शिनाख्त के साथ-साथ टाइम, फंड और ऊर्जा की बचत होती है। जर्मनी की कंपनी- श्राडिंगर के जाने-माने वैज्ञानिक प्रितेश भट्ट, विनोद देवराजी, कौशिक कासोझाला, प्रज्ज्वल नांदेकर कम्प्यूटेशनल मेथड इन ड्रग डिस्कवरी पर छह अप्रैल को बेंगलुरु से वर्चुअली ट्रेनिंग देंगे। रिसर्च एंड डवलपमेंट सेंटर-आरडीसी की फैकल्टी एवं वर्कशॉप के कोऑर्डिनेटर डॉ. सोविक सूर ने बताया, वर्कशॉप में विज्ञान, फार्मेसी, मेडिकल और इंजीनियरिंग के स्टुडेंट्स, रिसर्चस और फैकल्टी शामिल होंगे। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. रघुवीर सिंह वर्कशॉप का छह अप्रैल को प्रातः 10 बजे वर्चुअली श्रीगणेश करेंगे जबकि 80 प्रतिभागी कंप्यूटर लैब में प्रशिक्षित होंगे। करीब छह घंटे की इस वर्कशॉप में टेक्निकल सवाल-जवाब भी होंगे। फैकल्टी ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड कंप्यूटिंग साइंसेज – एफओईसीएस के प्राचार्य प्रो. राकेश कुमार द्विवेदी ने उम्मीद जताई, फर्स्ट टाइम आयोजित यह वर्कशॉप ड्रग निर्माण से सम्बंधित विज्ञान और तकनीकी छात्रों को आत्मविश्वास से लबरेज करेगी।
वर्कशॉप में ये वैज्ञानिक सॉफ्टवेयर, उसके क्रियान्वयन, केमिकल स्ट्रक्चर एडिटिंग, एनर्जी मिनिमाइज़िंग, मॉलिक्युलर डॉकिंग, प्रोटीन सिलेक्शन, लीड ऑप्टिमाइजेशन, सिमुलेशन प्रक्रिया आदि को तकनीकी तौर पर समझायेंगे। हर लेक्चर के दौरान टेक्निकल सवाल-जवाब भी होंगे। वर्कशॉप के जरिए प्रतिभागियों को घातक स्ट्रेन को चिन्हित कर मारने में कारगर ड्रग का चुनाव करने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है, कम्प्यूटेशनल मेथड इन ड्रग डिस्कवरी से पहले कारगर ड्रग्स को चिन्हित करना बेहद मुश्किल था। परंपरागत तरीकों में जहरीले रसायनों का इस्तेमाल अधिक होता था, जिससे न केवल पर्यावरण प्रदूषित होता था, बल्कि फंड और टाइम भी बेजा खर्च होता था, जबकि अब कम्प्यूटेशनल मेथड में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ फंड और टाइम की बचत होती है। करीब दो दशक पूर्व ईजाद यह तकनीक विज्ञान के शोधार्थियों के लिए एक बेहतर रिसर्च करियर के रूप में उभरी है, साथ ही इसके क्रियान्वयन से फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री को पंख लग गए हैं।


























