छाले तुम्हारे पैरों के किस किस को दिखाऊं ! दिल का तुम्हारे दर्द मैं किस किस को सुनाऊं !! इस देश के करोड़ों युवाओं से क्या कहूँ ! बेरोजगार बेटों के मांओं से क्या कहूँ !! कुर्सी पे बैठते ही पूरी वेदना मरी ! द्वारे पे इनके आती है जनता डरी डरी !! आँसू नहीं रुकते मेरे ये दृश्य देखकर ! माँ पेट पालती है अपना बेटा बेचकर !! जीवन में अपने जो न कभी संतरी बने ! वो लोग आज मेरे दम पे मंतरी बने !! सहता है दर्द देश का ऐसा कथन हूँ मैं ! देखिए तो ध्यान से संसद भवन हूँ मैं !!
आज देश में कालाबाजारी, भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद और जातिवाद की समस्या जोरों से तूल पकड़ती जा रही है, लेकिन इससे समाज और देश को निजात दिलाने के लिए न तो देश की राजनीतिक पार्टियां अपने को आगे लाकर समाज में व्याप्त समस्या के समाधान पर गौर करती हुई दिख रही हैं, न ही वह समाज जो आजादी के पहले देश और समाज के लिए सबकुछ न्यौछावर कर देने को उतावला दिखाई पड़ता था,आज देश में बेरोजगारी और भुखमरी की समस्या व्याप्त है, लेकिन राजनीतिक दल अपने हितों को साधने के लिए संसद को केवल अपने हितों के साधने का अड्डा मानकर चल रहे हैं। हजारों करोड़ों रुपए खर्च करके जिस जनप्रतिनिधि को संसद में भेजा जाता है,वह उस संसद तक पहुंचते ही अपने सारे वादे और जिम्मेदारियों को भूलकर अपने हितों को लेकर राजनीति साधने में ही दिखाई पड़ता है। देश की आबादी में लगभग 20 लाख रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं, लेकिन उनके हितों को लेकर राजनीति करता हुआ कोई भी अपने बयानों के तीर भांजता नहीं दिखाई देता। देश की आजादी के बाद से देश में रहने वाले नेताओं के सुर ही नहीं बदले, समाज के रहवासियों का जीने का तरीका और उनका सलीका भी बदल चुका है। देश और समाज का सत्यानाश करके उन्हें केवल स्वहितों की पड़ी रहती है।
लेकिन आज भी समाज में एक ऐसा बर्ग बचा है वो है कविता का क्षेत्र जो आज भी समाज,राजनेताओं, नौकरशाही,मीडिया, व न्याय क्षेत्र को जगाने के लिये समाज के हर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने शब्दों को कविता के रूप में पिरोकर आत्मा को झकझोरने का कार्य करता है।
वर्तमान राजनीति पर व्यंग करते हुए ही देश के नौजवान कवि “अभय निर्भीक” की लिखी कविता आजकल सुर्खियां बटोर रही है,अभय निर्भीक की सोशल मीडिया पर उनकी अच्छी-खासी फैन फॉलोइंग है


























