लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पिछले तीन हफ्ते से जारी सियासी अटकलों और चर्चाओं के बीच सीएम योगी आदित्यनाथ दिल्ली आए। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक तमाम कयास लगाए जाते रहे। वहीं इन सबके बीच यूपी की सियासत के सबसे बड़े चेहरों में से एक राजनाथ सिंह पूरे परिदृश्य से बाहर दिखे। सीएम योगी ने दिल्ली आकर पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाकात की। लेकिन राजनाथ सिंह इन सबके बीच कहीं नजर नहीं आए। हां उनका एक ट्वीट जरूर सामने आया था, जिसमें उन्होंने सीएम योगी को जन्मदिन की शुभकामनाएं दी थीं। आखिर यूपी में सियासी गर्माहट के बीच कहां हैं राजनाथ सिंह? आइए इस सवाल का जवाब टटोलते हैं।
राजनाथ सक्रिय नहीं होना चाहते या…
क्या राजनाथ सिंह सक्रिय होने नहीं चाहते या इसकी वजह कुछ और है? इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार ने स्वदेश केसरी न्यूज को बताया, ‘2000 में राजनाथ सिंह जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। राजनाथ सिंह ने मुख्य रूप से केंद्र की राजनीति में खुद को स्थापित किया है। ऐसा बीजेपी के जानकार कहते हैं कि 2017 में योगी का मुख्यमंत्री पद के लिए उन्होंने समर्थन किया था। डिफेंस कॉरिडोर को लेकर बुंदेलखंड में विकास हो रहा है, कोरोना काल में भी लखनऊ में डीआरडीओ ने कोविड अस्पताल बनाया था। राजनाथ सिंह यूपी में सक्रिय तो हैं लेकिन राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं हैं। वह इसलिए भी ज्यादा सक्रिय नहीं होना चाहते हैं कि इससे एक संदेश जाएगा कि एक समानांतर नेतृत्व उभर रहा है। दोनों ही ठाकुर वर्ग से आते हैं। बीजेपी के मतदाताओं में गलत संदेश जाने की संभावना रहेगी।’
‘बीजेपी को उनके तजुर्बे का फायदा लेना चाहिए’
यूपी में सियासी कशमकश के बीच क्या राजनाथ सिंह के अनुभव का बीजेपी फायदा उठा सकती थी? स्वदेश केसरी न्यूज के इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि राजनाथ सिंह के अनुभवों और सुझावों का लाभ बीजेपी को कम से कम उत्तर प्रदेश के संदर्भ में लेना चाहिए था। यह भी संभव है कि यूपी को लेकर उचित तवज्जो ना मिलने के चलते राजनाथ सिंह इस पूरे मामले में कहीं नजर ना आए हों। लेकिन अगर वो इस प्रकरण में पड़ते तो शायद और अच्छी तरीके से इस मसले को सुलझाया जा सकता था और आगे चलकर सभी लोगों को साथ लेकर बीजेपी चल सकती थी। राजनाथ सिंह के समर्थक वर्ग सिर्फ एक जाति विशेष में नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग जातियों और क्षेत्रों में हैं। सबको साथ लेकर चलने की उनकी पुरानी सियासत रही है। गठबंधनों की सरकार भी चलाई है। सबसे विकट गठबंधन यूपी में जो था, उसको उन्होंने साधा था और चलाया था। उनका इस पूरी समस्या के समाधान में अगर योगदान होता तो वह बहुत प्रभावी होता, बड़ा सार्थक होता और आगे के लिए भी अच्छा होता। अबसे भी अगर बीजेपी चाहे तो आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए उनके अनुभवों का लाभ लेना चाहिए।’
‘अभी राजनाथ ने खुद को किया समायोजित’
2014 के पहले यूपी में एक दौर ऐसा था जब माना जाता था कि राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ दो ध्रुव हैं। वर्तमान में दोनों नेताओं की केमिस्ट्री कैसी है, इस पर वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘अभी की स्थिति यह है कि राजनाथ सिंह ने अपने आप को समायोजित कर लिया है। अब योगी के साथ टकराव जैसी कोई बात नहीं है। बल्कि कई मौकों पर आगे आकर वे खुद ही संवाद स्थापित करते नजर आए हैं। राजनाथ सिंह की जो पिछली लखनऊ यात्रा हुई है, उसमें योगी भी खुद अगवानी करने गए थे। अब दोनों के रिश्तों में बर्फ जैसी कोई बात दिखती नहीं है। सतह पर नहीं नजर आती है। अंदर से दिल मिले हैं कि नहीं मिले हैं ये नहीं कहा जा सकता है।’
‘जिस परिपाटी से आते हैं उसमें न्यूट्रल रोल बेस्ट’
तो क्या राजनाथ सिंह ने खुद को यूपी के संदर्भ में सीमित कर लिया है, इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘राजनाथ सिंह ने खुद को यूपी से इसलिए अलग कर लिया है, क्योंकि उनके लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं है। यहां राजनीतिक मुकाम हासिल करने के लिए कुछ बाकी नहीं है। इसलिए उनके सक्रिय होने का कोई लाभ नहीं है। इसके साथ ही लोकसभा का चुनाव उन्हें लखनऊ से ही लड़ना है। कलराज मिश्र, कल्याण सिंह और लालजी टंडन के बाद अब उनके समकक्ष कोई नेता रहा नहीं। आज की बीजेपी की पॉलिटिक्स में वह फिट नहीं होते हैं। बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी, पीएम मोदी और अमित शाह में जब तीखी जुबानी जंग चल रही थी, तब भी किसी गलत शब्द का इस्तेमाल उन्होंने नहीं किया। उनकी लीगेसी वाजपेयी जी की है और वह बीजेपी के मॉडरेट ग्रुप के माने जाते हैं। उनके लिए तटस्थ भूमिका ही सर्वोत्तम है।’


























